
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कतर में जन्मे दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी के विवाद में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने मामले को चार महीने के भीतर नए सिरे से विचार के लिए वापस भेज दिया है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल कल्याण सिद्धांत को लागू करते समय सभी प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में न रखने पर हाईकोर्ट की खामियों को भी रेखांकित किया।
मामले का संक्षिप्त विवरण:
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बच्चों के पिता कतर में इंजीनियर हैं, जबकि माता भारत में रहती हैं।
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दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हैं और 2015 में श्रीनगर में शादी की थी।
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वैवाहिक विवाद के बाद कतर की अदालत ने कस्टडी मां को दी, पिता को अभिभावक का दर्जा मिला।
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पढ़ाई के दौरान मां बच्चों को श्रीनगर ले आई, जिससे विवाद खड़ा हुआ।
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भारत में अभिभावक एवं आश्रित अधिनियम, 1890 के तहत पिता ने याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ:
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जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि बच्चों ने पिता के साथ रहने की इच्छा जताई।
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बड़े बच्चे ने कहा कि पिता की उपस्थिति पर्याप्त होगी, जबकि छोटे बच्चे बार-बार पिता के साथ जाने की इच्छा प्रकट करता रहा।
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दोनों बच्चे केवल अंग्रेजी बोलते हैं और स्थानीय बच्चों के साथ बातचीत में कठिनाई महसूस करते हैं।
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हाईकोर्ट ने इन पहलुओं को नजरअंदाज किया और सिर्फ संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया।
फैसले के महत्वपूर्ण बिंदु:
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है, लेकिन कस्टडी तय करने का एकमात्र फैक्टर नहीं है।
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माता-पिता का आचरण, शैक्षिक स्थिरता, वित्तीय क्षमता, जीवन परिस्थितियां और मौजूदा अदालती आदेश सभी प्रासंगिक हैं।
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हाईकोर्ट ने मां द्वारा शैक्षणिक सत्र के बीच बच्चों को कतर से ले जाने और कतर न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन जैसी घटनाओं को नहीं माना।
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सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर 2025 के विवादित फैसले को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से हाईकोर्ट में विचार के लिए भेजा।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय बच्चों की इच्छाओं और कल्याण को सर्वोच्च मानते हुए न्यायसंगत और व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है।