Friday, February 6

60 वर्षों से बकरी पालन पर प्रतिबंध, ताड़ी भी नहीं उतरती: नालंदा के नशामुक्त गांव ढकनिया की अनोखी मिसाल

नालंदा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में स्थित एक छोटा सा गांव इन दिनों पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह गांव है ढकनिया, जो चंडी प्रखंड के गंगौरा पंचायत अंतर्गत आता है। खास बात यह है कि इस गांव में बीते 60 वर्षों से बकरी पालन पर पूरी तरह प्रतिबंध है। इतना ही नहीं, गांव में ताड़ के सैकड़ों पेड़ मौजूद होने के बावजूद यहां ताड़ी निकालने और बेचने की परंपरा भी समाप्त कर दी गई है।

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यह गांव आज सामाजिक अनुशासन, आपसी भाईचारे और नशामुक्त जीवनशैली की ऐसी मिसाल बन चुका है, जो बिहार ही नहीं, पूरे देश के लिए प्रेरणा है।

बकरी पालन से शुरू हुआ विवाद, पंचायत ने बनाया नियम

ढकनिया गांव के ग्रामीणों के अनुसार, करीब 50-60 वर्ष पहले गांव में भी अन्य गांवों की तरह बकरी पालन आम था। लेकिन बकरियां अक्सर खुलकर घूमती थीं और दूसरे लोगों की फसलों को नुकसान पहुंचाती थीं।

इससे गांव में बार-बार झगड़े, विवाद और मनमुटाव होने लगा। फसल चर जाने को लेकर बात मारपीट तक पहुंच जाती थी।

ग्रामीण मुकेश सिंह और अरविंद पासवान बताते हैं कि बकरियों को हर समय बांधकर रखना संभव नहीं था। विवाद बढ़ता गया तो गांव के बुजुर्गों और पूर्वजों ने सामूहिक बैठक बुलाई और सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि गांव में बकरी पालन पूरी तरह बंद कर दिया जाए।

इसके बाद से आज तक यह नियम पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाया जा रहा है। गांव का कोई भी परिवार बकरी नहीं पालता।

ताड़ के पेड़ हैं, लेकिन ताड़ी नहीं उतरती

ढकनिया गांव की दूसरी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां ताड़ के सैकड़ों पेड़ मौजूद हैं, फिर भी ताड़ी नहीं निकाली जाती।

ग्रामीण बताते हैं कि दशकों पहले गांव में एक पासी परिवार ताड़ी उतारता था। इसके कारण बाहर से शराब पीने वाले लोग गांव आते थे और अक्सर झगड़ा-फसाद होता था। गांव की शांति भंग होने लगी थी।

तब जिस वर्ष बकरी पालन पर रोक लगी, उसी वर्ष ग्रामीणों ने ताड़ी निकालने और बेचने पर भी रोक लगा दी।

ग्रामीण बबन सिंह और अरविंद सिंह का कहना है कि यह गांव सरकार की शराबबंदी लागू होने से बहुत पहले ही पूरी तरह नशामुक्त बन चुका था।

न कोई शराब बेचता है, न कोई पीता है

गांव के लोगों का कहना है कि ढकनिया में न तो कोई शराब बेचता है और न ही कोई शराब पीता है। गांव के नियम इतने सख्त हैं कि बाहरी व्यक्ति भी यहां नशा करके आने से डरते हैं।

गांव के बुजुर्गों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन आज भी नई पीढ़ी पूरी निष्ठा से करती है।

जातीय समरसता और एकता की मिसाल

ढकनिया गांव की खास बात सिर्फ नियम नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक एकता भी है।

यहां राजपूत, यादव, रविदास और पासवान समाज के लोग रहते हैं, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि गांव में जातीय तनाव या आपसी भेदभाव नहीं के बराबर है।

सभी समाज के लोग मिलकर गांव के नियमों का पालन करते हैं और किसी भी विवाद को पंचायत और बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाता है।

बागवानी ने बदली गांव की पहचान

ग्रामीणों के अनुसार, गांव के सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्गीय सुरेंद्र बाबू ने ढकनिया में बागवानी को बढ़ावा दिया था। उनके प्रयासों से गांव में 100 से अधिक किस्म के आम और अमरूद के पेड़ लगाए गए।

आज यह गांव सिर्फ अनुशासन के लिए नहीं, बल्कि हरियाली और फल उत्पादन के लिए भी जाना जाता है।

स्व-अनुशासन की मिसाल बना ढकनिया

ढकनिया गांव की कहानी यह साबित करती है कि जब समाज खुद नियम बनाकर उन्हें ईमानदारी से लागू करता है, तो बिना प्रशासनिक दबाव के भी बड़ा बदलाव संभव है।

गांव के लोगों का कहना है कि उन्होंने यह निर्णय किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि अपने गांव की शांति और एकता बनाए रखने के लिए लिया था।

आज ढकनिया गांव बिहार में स्व-अनुशासन और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन गया है।

निष्कर्ष

नालंदा का ढकनिया गांव यह संदेश देता है कि विकास केवल योजनाओं और सरकारी आदेशों से नहीं आता, बल्कि समाज के भीतर जागरूकता और अनुशासन से भी आता है। 60 वर्षों से बकरी पालन पर रोक और दशकों से नशामुक्त जीवन, इस गांव को एक अनोखी पहचान देता है।

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