Thursday, February 5

अमेरिका के चक्कर में तेल के खेल में फंस गया भारत, चीन के हाथ में रूसी सप्लाई की चाबी

नई दिल्ली: अमेरिका के साथ 500 अरब डॉलर के ट्रेड डील के बाद भारत अब अपनी तेल खरीद नीति में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। सूत्रों के अनुसार तेल मंत्रालय और सरकारी तेल कंपनियां अब अमेरिका से अधिक तेल और गैस खरीदने पर विचार कर रही हैं, जबकि रूस से आयात में गिरावट आने की संभावना है।

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सरकारी कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने मंत्रालय के साथ मुलाकात में यह तय किया कि घरेलू मांग बढ़ने और रूस से सप्लाई कम होने की स्थिति में अधिक एडजस्टमेंट करना पड़ेगा। हालांकि, अमेरिका से तेल की कीमत पश्चिम एशिया की तुलना में लगभग 2 डॉलर प्रति बैरल अधिक है।

अमेरिका से सप्लाई में बढ़ोतरी

पिछले साल फरवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह चाहते हैं कि अमेरिका भारत में तेल और गैस का सबसे बड़ा सप्लायर बने। उसके बाद भारत ने अमेरिका से तेल और एलपीजी आयात बढ़ाने के लिए कई डील कीं। Kpler के आंकड़ों के अनुसार भारत को अमेरिका से सप्लाई में 60% की तेजी दर्ज की गई, यानी रोजाना 3,18,000 बैरल तेल पहुंचा। भारत ने अमेरिका से 2.2 मिलियन टन एलपीजी खरीदने के लिए दिसंबर 2025 में डील की, जो देश के कुल एलपीजी आयात का लगभग 10% है।

आने वाले महीनों में भारत के अमेरिका से तेल आयात में और वृद्धि की उम्मीद है। हालांकि रूस से आयात पूरी तरह बंद नहीं होगा, लेकिन पहले बुक किए गए कार्गो मार्च तक पहुंचेंगे। जनवरी में केवल इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और नयारा एनर्जी को रूसी सप्लाई मिली, जो 2025 के औसत की तुलना में 30% कम थी।

रूस से तेल खरीदने का पेच

एक सूत्र के अनुसार, रूस से तेल खरीदने का फैसला अब कमर्शियल और डिप्लोमैटिक दोनों स्तर पर प्रभावित हो गया है। भारत के लिए समस्या यह नहीं कि रूसी तेल खरीदा जाए, बल्कि यह है कि रूस से तेल कहाँ जाएगा। अगर चीन इसे अधिक डिस्काउंट पर ले लेता है, तो भारत के लिए अन्य सप्लाई मुक्त हो सकती है और कीमतें स्थिर रहेंगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता, तो रूसी उत्पादन बाधित हो सकता है और सप्लाई तंग होने से कीमतें बढ़ सकती हैं।

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