Sunday, April 26

JF-17 लड़ाकू विमान की बढ़ती मांग: सऊदी-बांग्लादेश की दिलचस्पी, लेकिन चीन के साथ बनाने वाला पाकिस्तान क्यों फंस गया?

पाकिस्तान और चीन के संयुक्त रूप से विकसित JF-17 थंडर लड़ाकू विमान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुचि बढ़ती दिख रही है। पाकिस्तान की सेना का दावा है कि सऊदी अरब, बांग्लादेश, इराक और इंडोनेशिया समेत कई देशों ने इस फाइटर जेट में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि, इसी बढ़ती मांग ने पाकिस्तान को एक नई मुश्किल में डाल दिया है।

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पाकिस्तानी सेना के अनुसार, बीते कुछ महीनों में कम से कम पांच देशों के साथ JF-17 की बिक्री को लेकर बातचीत हुई है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सऊदी अरब और लीबिया इस विमान को लेकर विकल्प तलाश रहे हैं। लेकिन जिन देशों के नाम लिए जा रहे हैं, उनमें से किसी ने भी अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

चीन की बड़ी हिस्सेदारी, पाकिस्तान की सीमित क्षमता

JF-17 लड़ाकू विमान का निर्माण पाकिस्तान और चीन मिलकर करते हैं, जिसमें 65 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की और 35 प्रतिशत पाकिस्तान की है। असल समस्या यहीं से शुरू होती है। पाकिस्तान के पास हर साल 20 से भी कम JF-17 विमान बनाने की क्षमता है और जो विमान बनते हैं, वे लगभग सभी पाकिस्तान वायुसेना को ही सौंप दिए जाते हैं।

ऐसे में यदि वास्तव में सऊदी अरब, इंडोनेशिया या अन्य देशों से बड़े ऑर्डर मिलते हैं, तो पाकिस्तान के लिए इस मांग को पूरा करना बेहद कठिन होगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन क्षमता बढ़ाए बिना पाकिस्तान का निर्यात सपना हकीकत में बदलना मुश्किल है।

किफायती कीमत बनी ताकत

सिंगापुर स्थित एस. राजारत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के रिसर्च फेलो मनोज हरजानी का कहना है कि JF-17 को इसकी कम कीमत और हालिया युद्ध अनुभव की वजह से “मार्केट में बदलाव लाने वाला” विमान माना जा रहा है।
उनके अनुसार, ऐसे देश जो महंगे पश्चिमी लड़ाकू विमानों को खरीदने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए JF-17 एक आकर्षक विकल्प बन सकता है।

लेकिन खरीद पर उठ रहे हैं सवाल

हालांकि, कई बड़े सवाल भी सामने हैं।
इंडोनेशिया पहले ही फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की डिलीवरी लेना शुरू कर चुका है और उसने अमेरिका से F-15 जेट खरीदने का समझौता भी किया है। वहीं सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिकी और यूरोपीय लड़ाकू विमानों पर निर्भर रहा है और F-35 को लेकर भी बातचीत चल रही है।

ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि ये देश वास्तव में पाकिस्तानी JF-17 को अपने बेड़े में शामिल करेंगे या नहीं।

कीमत कम, लेकिन निवेश बड़ा सवाल

पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री रज़ा हयात हरराज के अनुसार, JF-17 की प्रति यूनिट कीमत 40 से 50 मिलियन डॉलर है, जबकि राफेल और F-16 जैसे विमानों की कीमत 100 मिलियन डॉलर से भी अधिक होती है।

लेकिन जर्मन मार्शल फंड के सीनियर फेलो समीर लालवानी का कहना है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होगी। ऐसे में सवाल उठता है कि गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान इस निवेश के लिए धन कहां से लाएगा।

निष्कर्ष

JF-17 की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय चर्चा पाकिस्तान के लिए एक अवसर जरूर है, लेकिन सीमित उत्पादन क्षमता, चीन पर निर्भरता और आर्थिक कमजोरियां इस अवसर को एक बड़ी चुनौती में बदलती नजर आ रही हैं।

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