
डॉक्टरों का कहना है कि किसी व्यक्ति की आवाज उसके स्वास्थ्य का अहम संकेत देती है। पार्किंसन, डिमेंशिया, फेफड़ों की बीमारी या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का शुरुआती पता आवाज में बदलाव से लगाया जा सकता है। ऐसे बदलाव को अनदेखा करना खतरनाक हो सकता है।
असम के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विकाश अग्रवाल के अनुसार, 60 वर्षीय एक बुजुर्ग मरीज ने बताया कि उनकी पत्नी अब उनसे बहुत धीरे और नरमी से बात करती हैं। जांच में सामने आया कि उन्हें हाइपोफोनिया नामक समस्या है, जिसमें आवाज की तीव्रता धीरे-धीरे कम हो जाती है। यह पार्किंसन डिजीज का शुरुआती संकेत हो सकता है।
डॉ. अग्रवाल का कहना है कि कई मरीजों में हाथ कांपने जैसे सामान्य लक्षण नहीं दिखाई देते, लेकिन आवाज का बदलना बीमारी का संकेत हो सकता है।
आवाज के जरिए स्वास्थ्य के संकेत
हार्मोनल बदलाव, डिप्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य: आवाज में सपाटपन या अत्यधिक तेज बोलना मानसिक स्वास्थ्य की समस्या की ओर इशारा कर सकता है।
फेफड़ों और गले की बीमारियाँ: लगातार बैठी आवाज या सांस फूलना फेफड़ों की क्षमता कम होने का संकेत है।
कैंसर और नशा: लंबे समय तक आवाज बैठी रहना, स्मोकिंग या शराब पीना गले या फेफड़ों के कैंसर का संकेत हो सकता है।
एआई और वोकल बायोमार्कर
चेन्नई की मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन और बेंगलुरु के सेंटर फॉर ब्रेन रिसर्च ने आवाज के पैटर्न का विश्लेषण करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग शुरू किया है। इसे वोकल बायोमार्कर कहा जाता है। AI के माध्यम से डिमेंशिया जैसे रोगों के शुरुआती लक्षण बिना किसी इनवेसिव टेस्ट के पहचाने जा सकते हैं।
डॉक्टरों की सलाह
ईएनटी विशेषज्ञ और लैरिंजोलॉजिस्ट डॉ. राघवी विष्णु प्रसन्ना बताती हैं कि उम्र बढ़ने और अकेले रहने से वोकल कॉर्ड्स कमजोर हो सकती हैं। इसलिए लंबे समय तक आवाज में बदलाव नजर आए तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी तरह के उपचार या दवा का विकल्प नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर हमेशा योग्य डॉक्टर से परामर्श करें।