
कल्याण। महाराष्ट्र की 29 नगरपालिकाओं में मेयर पद के आरक्षण को लेकर गुरुवार को निकाली गई लॉटरी ने कल्याण–डोंबिवली महानगरपालिका (केडीएमसी) की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। लॉटरी के जरिए यह स्पष्ट हो गया कि इस बार कल्याण–डोंबिवली में मेयर पद अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए आरक्षित रहेगा। इस फैसले के साथ ही बीजेपी की मेयर बनने की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया है, जबकि एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के लिए नए अवसर खुल गए हैं।
15 जनवरी को हुए मतदान और 16 जनवरी को आए नतीजों के बाद से ही सबकी नजर इस बात पर टिकी थी कि किस नगर निगम में मेयर का पद किस वर्ग को मिलेगा। 22 जनवरी को आरक्षण की लॉटरी निकाली गई, जिसमें पहली ही पर्ची एसटी वर्ग के नाम निकली और कल्याण–डोंबिवली नगर निगम का मेयर पद इसी वर्ग के लिए आरक्षित घोषित कर दिया गया।
बीजेपी का दावा पूरी तरह खत्म
आरक्षण की घोषणा के साथ ही यह साफ हो गया कि केडीएमसी में बीजेपी मेयर की दौड़ से बाहर हो गई है। दरअसल, नगर निगम में बीजेपी के पास अनुसूचित जनजाति वर्ग से एक भी नगरसेवक नहीं है। ऐसे में पार्टी के लिए मेयर पद पर दावा करना असंभव हो गया है। इस घटनाक्रम को बीजेपी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।
तीन नाम, तीन संभावनाएं
अब सवाल यह है कि कल्याण–डोंबिवली का अगला मेयर कौन होगा? एसटी वर्ग से नगर निगम में कुल तीन नगरसेवक हैं। इनमें शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) की दो नगरसेविकाएं—किरण भंगले और हर्षाली थविल—शामिल हैं। वहीं, मनसे की ओर से शीतल मंधारी भी एसटी वर्ग की नगरसेविका हैं और मेयर पद की प्रबल दावेदार मानी जा रही हैं।
शिंदे गुट की मजबूत स्थिति, मनसे भी खेल में
संख्या बल के लिहाज से देखा जाए तो एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के पास एसटी वर्ग के दो नगरसेवक होने का फायदा है, जिससे उसकी स्थिति मजबूत नजर आ रही है। हालांकि, मनसे की एकमात्र एसटी नगरसेविका भी समीकरण बिगाड़ने या गठजोड़ की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मेयर पद के लिए किस नाम पर मुहर लगती है। इतना तय है कि कल्याण–डोंबिवली में इस बार सत्ता की चाबी बीजेपी के हाथ से निकल चुकी है और राजनीतिक बाजी शिंदे गुट और मनसे के बीच सिमट गई है।