Wednesday, January 21

‘मां नहीं रहीं, पिता ने छोड़ा… अफसर बनना है’ — 8 साल की राधिका का सपना संवारेंगे जालौन के अफसर मासूम की पीड़ा सुनकर भावुक हुए डीएम–एसपी, शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी ली प्रशासन ने

जालौन। “मां मर गई है… पापा ने छोड़ दिया… लेकिन मैं पढ़-लिखकर बड़ी अफसर बनना चाहती हूं।”

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जन चौपाल में जब 8 वर्षीय राधिका ने कांपती आवाज में अपनी यह बात कही, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। मासूम बच्ची की दर्दभरी कहानी सुनकर जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय और पुलिस अधीक्षक डॉ. दुर्गेश कुमार भी खुद को भावुक होने से नहीं रोक सके।

 

यह मार्मिक दृश्य विकासखंड रामपुरा के ग्राम पंचायत कंझारी में आयोजित जन चौपाल के दौरान सामने आया। राधिका मंच पर पहुंची और अधिकारियों को बताया कि उसकी मां का निधन हो चुका है और पिता उसे छोड़कर चले गए हैं। अब वह अकेली और बेसहारा है, लेकिन हालात कितने ही कठिन क्यों न हों, उसका सपना है कि वह पढ़ाई करके एक दिन बड़ी अफसर बने।

 

प्रशासन ने थामा सहारा

राधिका की बात सुनते ही डीएम और एसपी ने उसे मंच पर अपने पास बैठाया। डीएम राजेश कुमार पाण्डेय ने मौके पर ही घोषणा की कि जिला प्रशासन राधिका की पूरी शिक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी उठाएगा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक बच्ची का सपना नहीं, बल्कि प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है कि उसे साकार किया जाए।

 

इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि राधिका को बाल सेवा योजना, कन्या सुमंगला योजना सहित सभी पात्र सरकारी योजनाओं का लाभ तत्काल दिलाया जाए, ताकि उसकी पढ़ाई और जीवन में किसी तरह की आर्थिक बाधा न आए।

 

जन चौपाल के बाद गांव का निरीक्षण

इस भावुक घटना के बाद डीएम और एसपी ने गांव का पैदल भ्रमण कर जमीनी हकीकत भी परखी। आवास, पेंशन, राशन कार्ड, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना और स्वच्छ भारत अभियान समेत विभिन्न योजनाओं का मौके पर सत्यापन किया गया। जहां भी कमियां मिलीं, वहां तत्काल सुधार के आदेश दिए गए।

 

निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि गांव में बच्चों के खेलने के लिए कोई खेल मैदान नहीं है। इस पर डीएम ने सख्त रुख अपनाते हुए 31 मार्च 2026 तक खेल मैदान निर्माण का आदेश दिया। साथ ही गांव के तालाब के सौंदर्यीकरण, पाथवे निर्माण और व्यापक वृक्षारोपण के निर्देश भी दिए गए।

 

उम्मीद की मिसाल बनी राधिका

राधिका की कहानी अब केवल एक बच्ची की पीड़ा नहीं रही, बल्कि यह प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय जिम्मेदारी की मिसाल बन गई है। एक मासूम के सपनों को पंख देने का यह संकल्प न सिर्फ राधिका का भविष्य बदलेगा, बल्कि समाज को भी यह संदेश देगा कि सहानुभूति और संकल्प से किसी की तकदीर बदली जा सकती है।

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