Thursday, June 18

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चुपचाप गायब हो रही चांदी: भारत में बढ़ती मांग ने दुनिया को चौंकाया, चीन के सोने पर टिकी रही नजर

नई दिल्ली।
जब पूरी दुनिया चीन की आक्रामक सोना खरीद पर नजरें जमाए बैठी है, उसी दौरान भारत में एक बड़ा बदलाव चुपचाप हो रहा है—चांदी तेजी से गायब हो रही है। यह दावा किया है चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने, जिन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर चांदी से जुड़े बदलते रुझानों की ओर ध्यान खींचा है।

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उनका कहना है कि बाजार सिर्फ सुर्खियों से नहीं चलते। कई बार असली हलचल कारखानों, घरों और आम लोगों की बदलती आदतों से जन्म लेती है। इस समय वही कहानी चांदी के साथ लिखी जा रही है।

रिकॉर्ड आयात, बढ़ती जरूरत
यह विश्लेषण ऐसे समय सामने आया है, जब चांदी हाल ही में ₹3 लाख प्रति किलोग्राम के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत ने 5,000 टन से अधिक चांदी का आयात किया, जो दुनिया के सालाना उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिर्फ ट्रेडिंग या सट्टेबाजी नहीं, बल्कि असली धातु की वास्तविक जरूरत को दर्शाता है। जब कोई एक देश इतनी बड़ी मात्रा में वैश्विक सप्लाई को अपने पास खींच लेता है, तो यह बाजार की गहरी मांग का संकेत होता है।

अब सिर्फ गहनों की बात नहीं
नितिन कौशिक के मुताबिक, चांदी की मांग अब शादी-ब्याह और गहनों तक सीमित नहीं रही। भारत के सौर ऊर्जा मिशन ने चांदी को एक रणनीतिक औद्योगिक धातु बना दिया है।
पश्चिमी भारत में स्थापित विशाल सोलर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में रोजाना पैनल बनाने के लिए चांदी के पेस्ट का इस्तेमाल हो रहा है। चूंकि भारत में चांदी का खनन बेहद सीमित है, इसलिए हर नई फैक्ट्री, हर नई उत्पादन लाइन और हर नया सौर लक्ष्य सीधे तौर पर आयात बढ़ा रहा है।
वैश्विक स्तर पर भी सौर ऊर्जा उद्योग हर साल करोड़ों औंस चांदी खपा रहा है—और यह मांग कीमतें बढ़ने पर भी कम नहीं होती।

बचत का नया ठिकाना बनी चांदी
औद्योगिक मांग के साथ-साथ घरों में भी बड़ा बदलाव दिख रहा है।
महंगाई पूरी तरह काबू में नहीं है, नकद रखना असुरक्षित लगता है और वैश्विक झटकों के बीच रुपया कमजोर महसूस होता है। सोना आम आदमी को महंगा लगने लगा है, जबकि चांदी अपेक्षाकृत सस्ती नजर आती है।
नतीजा यह हुआ कि छोटी चांदी की छड़ें, सिक्के और सिल्वर ETF मध्यम वर्ग के लिए सुरक्षित निवेश का जरिया बनते जा रहे हैं।
भारतीय सिल्वर ETF को वास्तविक चांदी से समर्थित होना पड़ता है। यानी निवेश का हर रुपया वैश्विक तिजोरियों से चांदी निकालकर लंबे समय के लिए जमा करता है। 2025 में कई मौकों पर सिर्फ एक महीने में ETF में करोड़ों रुपये का निवेश देखा गया—यह सट्टा नहीं, बल्कि बचत का पैसा है।

कमी बनी रही तो उछलती रहेंगी कीमतें
कौशिक बताते हैं कि 2025 के मध्य तक वैश्विक चांदी भंडार में भारी गिरावट देखी गई थी। बाद में थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन भारत में स्थानीय स्तर पर कमी लगातार गहराती रही।
एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय हाजिर बाजार में चांदी अंतरराष्ट्रीय कीमतों से दोगुने से अधिक प्रीमियम पर बिक रही थी। आयात शुल्क भी खरीदारों को रोक नहीं सका। यह साफ संकेत था कि मांग कीमत पर नहीं, जरूरत पर आधारित है।

2030 तक दबाव बना रहेगा
विशेषज्ञों के मुताबिक, बड़ी तस्वीर और भी स्पष्ट है। भारत ने 2030 तक सैकड़ों गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है। यह कोई कारोबारी फैसला नहीं, बल्कि नीतिगत प्रतिबद्धता है।
जब तक हरित ऊर्जा का विस्तार जारी रहेगा, चांदी की मांग कम नहीं होगी। सीमित आपूर्ति के बीच यह धातु गहनों, निवेश और तकनीक—तीनों से प्रतिस्पर्धा करती रहेगी। इसी वजह से चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज, असहज और अचानक नजर आ रहा है।

निष्कर्ष
नितिन कौशिक के शब्दों में—“सोने को सुर्खियां मिलती हैं, चांदी असली मेहनत करती है।”
इस समय भारत मुनाफे की दौड़ में नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने में जुटा है। और बाजार अंततः लोगों के व्यवहार का ही अनुसरण करते हैं।
चांदी को लेकर भारत का व्यवहार अब साफ तौर पर बदल चुका है—और यही बदलाव आने वाले समय में कीमतों की दिशा तय करेगा।

 

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