
नई दिल्ली: NEET PG 2025-26 की कट-ऑफ 40 नंबर तक घटाने का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। एक जनहित याचिका (PIL) में इस फैसले को प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों और माफियाओं को फायदा पहुँचाने वाला बताया गया है।
नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेस (NBEMS) ने 13 जनवरी को जारी नोटिस में जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ 103 मार्क्स (7वीं पर्सेंटाइल) और आरक्षित कैटेगरी के लिए -40 मार्क्स (0वीं पर्सेंटाइल) तय किया। बोर्ड ने कहा कि देश भर में लगभग 10,000-18,000 मेडिकल सीटें खाली पड़ी हैं, जिन्हें भरने के लिए यह कदम जरूरी था। सरकार का तर्क है कि इन सीटों को खाली रखना महंगा और व्यावहारिक रूप से मुश्किल है।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इसे असामान्य और योग्यता को कमजोर करने वाला कदम बताया। याचिका संयुक्त रूप से हरिशरण देवगन, न्यूरोसर्जन सौरभ कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल (यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट) और डॉ. आकाश सोनी (वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन) ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि “मेडिसिन कोई सामान्य पेशा नहीं है, यह सीधे इंसानी जीवन, शारीरिक अखंडता और गरिमा से जुड़ा है। इस तरह की कट-ऑफ केवल सीट भरने के आधार पर तय करना मेरिट को खत्म करता है और पेशेवर मानकों में गिरावट लाता है।”
यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल ने कहा, “यह फैसला मेडिकल सीटों की नीलामी का रास्ता खोल रहा है। कम योग्यता वाले डॉक्टरों को PG ट्रेनिंग में शामिल करना मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा है। यही कारण है कि हमने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।”
इस फैसले के आलोचक इसे प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की लाभकारी योजना मान रहे हैं, जबकि समर्थक कहते हैं कि यह खाली सीटों को भरने के लिए आवश्यक था। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर टिकी हैं, जो भविष्य में NEET PG की कट-ऑफ और मेडिकल शिक्षा के मानकों को प्रभावित कर सकती है।