
नई दिल्ली।
हिंदी सिनेमा के महानायक दिलीप कुमार न सिर्फ़ अपनी अदाकारी के लिए, बल्कि अपने व्यक्तित्व और सामाजिक सरोकारों के कारण भी हमेशा चर्चा में रहे। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उनका नाम उस समय सुर्खियों में आया, जब उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को कम करने की कोशिश में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से सीधे बातचीत की थी। हालांकि, बाद में पाकिस्तान सरकार से मिला सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ उन्हें देश के भीतर विवादों में भी ले आया।
वाजपेयी की मौजूदगी में हुई थी बातचीत
इस घटना का खुलासा पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने वर्ष 2015 में भारत दौरे के दौरान किया था। उनके अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कारगिल की स्थिति पर चर्चा के लिए नवाज़ शरीफ को फोन किया था। उसी दौरान दिलीप कुमार भी वहां मौजूद थे और उन्हें बातचीत में शामिल किया गया।
बताया जाता है कि फोन पर वाजपेयी ने नवाज़ शरीफ से कहा कि लाहौर यात्रा के बाद पाकिस्तान की ओर से कारगिल में सैन्य कार्रवाई बेहद निराशाजनक रही। नवाज़ शरीफ ने दावा किया कि उन्हें इस सैन्य अभियान की पूरी जानकारी नहीं थी। इसके बाद दिलीप कुमार ने बातचीत में हस्तक्षेप करते हुए नवाज़ शरीफ से कहा—
“मियां साहब, हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप हमेशा भारत-पाक शांति के समर्थक रहे हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि भारत-पाक तनाव का सीधा असर भारत में रहने वाले मुसलमानों पर पड़ता है और ऐसे हालात में वे खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।
कुछ दिन शांत रही स्थिति, फिर भड़का युद्ध
माना जाता है कि इस बातचीत के बाद कुछ समय के लिए हालात स्थिर हुए, लेकिन जल्द ही संघर्ष फिर तेज़ हो गया और लगभग तीन महीने तक कारगिल युद्ध चला।
पाकिस्तानी पुरस्कार बना विवाद की जड़
कारगिल युद्ध से एक साल पहले, 1998 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ से सम्मानित करने की घोषणा की थी। दिलीप कुमार यह पुरस्कार लेने पाकिस्तान भी गए। इसी फैसले को लेकर भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने इस कदम का खुलकर विरोध किया और दिलीप कुमार पर भारत के प्रति वफादारी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर दिलीप कुमार पुरस्कार नहीं लौटाते, तो उन्हें भारत छोड़कर पाकिस्तान में रहना चाहिए।
‘65 साल बाद भी वफादारी साबित करनी होगी?’
इस बयान से दिलीप कुमार बेहद आहत हुए। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा—
“65 साल इस देश में रहने के बाद भी मुझे अपनी वफादारी साबित करनी पड़े, यह बेहद दुखद है।”
वहीं एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने बाल ठाकरे के बयान को “घिनौना और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला” बताया।
सिनेमा से आगे भी एक संवेदनशील नागरिक
दिलीप कुमार का यह पूरा प्रसंग बताता है कि वे सिर्फ़ एक महान अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक ऐसे नागरिक भी थे जो शांति, सौहार्द और मानवीय संवेदनाओं को सबसे ऊपर रखते थे। हालांकि, उनके यही प्रयास और फैसले उन्हें कई बार राजनीतिक और वैचारिक विवादों के केंद्र में भी ले आए।