Friday, January 16

कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय की भांजी ने लूटी महफिल, मासूम अंदाज़ पर सबने लुटाया प्यार

बरसाना धाम।
प्रसिद्ध कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय इन दिनों अपने पारिवारिक और धार्मिक आयोजनों को लेकर लगातार चर्चा में हैं। हाल ही में बरसाना धाम में श्री गिरधरलाल जी के विवाह उत्सव के बाद जहां इंद्रेश उपाध्याय और उनकी पत्नी शिप्रा के सादगीपूर्ण और भक्तिमय रूप की सराहना हो रही थी, वहीं अब इस आयोजन की सबसे बड़ी आकर्षण उनकी नन्ही भांजी श्रीवन्या बन गई हैं।

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पांच दिनों तक चले विवाह उत्सव के दौरान श्रीवन्या की मासूमियत और पारंपरिक परिधानों ने हर किसी का मन मोह लिया। इंद्रेश उपाध्याय की बहन श्रुति शर्मा की पुत्री श्रीवन्या हर दिन अलग-अलग देसी परिधानों में नजर आईं और श्रद्धा व सरलता से भगवान की सेवा करती दिखीं। सोशल मीडिया पर उनके फोटो और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं।

फ्लोरल लहंगे में बनीं आकर्षण का केंद्र

विवाह समारोह के दौरान श्रीवन्या ने सफेद और गुलाबी रंग का फ्लोरल लहंगा पहना, जिसमें वह अत्यंत प्यारी लगीं। सेवा करते समय जब मौसी ने उनके सिर पर दुपट्टा ओढ़ा दिया और मामी ने घूंघट वैसे ही रखने को कहा, तो वह मुस्कुराते हुए उसी रूप में सेवा करती रहीं। यह दृश्य उपस्थित लोगों के लिए बेहद भावुक और मनमोहक रहा।

पारंपरिक परिधान में दिखी सादगी और समझदारी

सर्दी को ध्यान में रखते हुए श्रीवन्या के परिधान में फुल स्लीव्स चोली और अंदर हाईनेक पहनाई गई थी, जो फैशन के साथ-साथ बच्चों की सेहत का भी ध्यान रखने का सुंदर उदाहरण है। सुनहरी गोटा-पट्टी, कमरबंध और टीका ने उनके पारंपरिक लुक को और निखार दिया।

हर परिधान में दिखी मासूम खूबसूरती

लहंगे के अलावा श्रीवन्या फ्रॉक और अन्य पारंपरिक ड्रेसेस में भी नजर आईं। ऊनी फ्रॉक, चोटी में मोतियों की सजावट और सौम्य रंगों के संयोजन ने उनके बाल सुलभ सौंदर्य को और उभार दिया। हर परिधान में उनकी सादगी और मासूम मुस्कान ने लोगों का दिल जीत लिया।

सोशल मीडिया पर मिल रहा अपार स्नेह

जहां एक ओर इंद्रेश उपाध्याय और उनकी पत्नी की सादगी की चर्चा हो रही है, वहीं दूसरी ओर श्रीवन्या की क्यूटनेस पर लोग खुलकर प्यार लुटा रहे हैं। कई लोग उन्हें ‘घर की लाडली’ और ‘छोटी गोपी’ कहकर संबोधित कर रहे हैं।

निष्कर्ष:
धार्मिक वातावरण, पारिवारिक स्नेह और मासूम बचपन के मेल ने इस विवाह उत्सव को यादगार बना दिया। श्रीवन्या की सरलता और निश्छलता ने यह साबित कर दिया कि कई बार सबसे छोटी मौजूदगी ही सबसे बड़ी छाप छोड़ जाती है।

 

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