OPINION: वेंटिलेटर स्टोर रूम में, ऑक्सीजन प्लांट फाइलों में, ऐसे कैसे कोरोना के खिलाफ जीतेंगे जंग?

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पटना. देश में व्याप्त मौजूदा स्वास्थ्य संकट को देखकर एक नागरिक के अंदर कई तरफ के भाव उमड़ रहे होंगे- गुस्सा, हताशा और निराशा का, कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. क्या इस महामारी (Pandemic) को पहले रोका नहीं जा सकता था? जिस देश ने कोरोना संक्रमण (Corona Virus) का पहला दौर बखूबी संभाल लिया, अब वहां सारी व्यवस्था चरमराती क्यों दिख रही है. लोगों को अस्पताल में बेड क्यों नहीं मिल पा रहे हैं, मुफ्त में दवाइयां क्यों नहीं मिल पा रही हैं.

ऑक्सीजन सिलिंडर (Oxygen Cylinder) अस्पताल में जरूरतमंदों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है, वेंटीलेटर स्टोर रूम में पड़े-पड़े धूल क्यों खा रहे हैं.

महामारी ने हम सबकी आंखें खोल दी 
निराशा के माहौल में क्या हम उम्मीद करना छोड़ दें कि हम इस जंग को जीत नहीं सकते, या हम प्रयास करना छोड़ दें, या फिर उम्मीद करना छोड़ दें? वर्ष 2020 में हमने कठोर अनुशासन का पालन किया, सब्र रखा और हम उस महामारी से बाहर निकल गए. लेकिन हमने उस सूक्ष्म और अदृश्य शत्रु को नजरअंदाज किया जो अपने अंदर पिछले एक वर्ष में कई बदलाव ला चुका था. आपको याद होगा, सितंबर 2020 से लेकर फरवरी के मध्य का समय था हमारे पास, इन पांच महीनों में हम अपने मेडिकल सिस्टम को बहुत ज्यादा दुरुस्त कर सकते थे लेकिन हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहे.

पीएम केयर्स फंड से 2000 करोड़ की राशि वेंटीलेटर के लिए एलोकेट (आवंटन) कर तकरीबन सभी राज्यों के बीच लगभग 50,000 वेंटीलेटर भेजे गए. ताकि मुश्किल वक्त में इसका इस्तेमाल किया जा सके लेकिन हमने उसे इस्तेमाल तो करना दूर, ज्यादातर राज्यों ने उस डब्बे के अंदर झांककर देखा तक नहीं.
रविवार सुबह ही मुझे जम्मू से एक मित्र का फोन आया कि जम्मू-कश्मीर में पीएम केयर्स फंड की तरफ से 400 वेंटीलेटर दिये गए थे, लेकिन इसमें ज्यादातर को इंस्टाल नहीं किया गया, बहुत तो स्टोर रूम की शोभा बढ़ा रहे हैं.

कमोवेश यही हाल बिहार का है, झारखंड का है, महाराष्ट्र का है, राजस्थान का है, जहां केंद्र द्वारा भेजे गए वेंटीलेटर की अनदेखी की गई, उसे समय रहते इस्तेमाल में नहीं लाया गया.क्या आप प्यास लगने पर कुआं खोदते हैं?
बिहार, झारखंड सहित कई स्थानों पर हमने पता करने की कोशिश कि तो यही पता चला कि वेंटीलेटर इसलिए नहीं चलाया गया गया है क्योंकि इसके लिए स्टाफ नहीं हैं, अगर हैं भी तो वो इसके लिए दक्ष नहीं हैं. कई जिलों में तो स्टाफ के लिए अभी वेकेंसी निकली जा रही है. मतलब प्यास लगने पर आप एक तरह से कुआं खोद रहे हैं.

अगर आप राज्य में सरकार चला रहे हैं, तो आपका काम है कि आप वेंटीलेटर सप्लाई करने वाली कंपनी से बात करें, इसके इंस्टालेशन में अगर कहीं विघ्न (समस्या) आ रहा है तो आप कस्टमर केयर से बात कर सकते हैं. अगर आप अपने घर में टीवी या फ्रिज खरीदकर लाते हैं तो क्या आप उसे इंस्टाल करवाने के लिए कंपनी के एक्जेक्यूटिव की मदद लेते हैं या नहीं. या आप उसे जाकर सड़क पर बाहर फेंक देते हैं. यह तो कॉमन सेंस की बात है.

दूसरी बात, अगर आपके पास इसके लिए ट्रेंड स्टाफ नहीं है तो भर्ती कीजिये, किसने आपको रोका है? वेंटीलेटर चलाना कोई रॉकेट साइंस तो नहीं है जिसे सीखा नहीं जा सकता है. न्यूज़ 18 बिहार-झारखंड लगातार वेंटीलेटर के मुद्दे को उठाता रहा, जिसके बाद बिहार सरकार ने रविवार को करीब 200 वेंटीलेटर को प्राइवेट अस्पतालों को देने का फैसला किया गया, जिनके पास इन मशीनों को चलाने के लिए दक्ष मैन पावर हो. सरकार की तरफ से यह फैसला देर से आया है.

एक मीडिया संगठन होने के नाते हमारी जिम्मेदारी भी काफी अहम है. यह संभव नहीं कि जिला स्तर पर या ग्रामीण स्तर पर आप दिल्ली में या पटना में बैठकर अस्पतालों के कर्मचारियों की बेरुखी और जिलाधिकारियों की उदासीनता की परख कर सकें. लेकिन यह बेहद जरूरी है अगर शासन मर्ज के पनपने से पहले ही उसका मुकम्मल इलाज कर दे.

हताशा और निराशा के बाद उम्मीद क्यों नहीं?
आखिर में मैं हताशा, निराशा और गुस्सा के बाद इच्छा-शक्ति और उम्मीद पर अपनी बात खत्म करूंगा. अगर आपने कुछ ठान लिया तो आप उसे पूरा कर सकते हैं, दुनिया की कोई भी ताकत आपको उसे पूरा करने से नहीं रोक सकती है.

महाराष्ट्र में नंदुरबार एक छोटा सा जिला है, आर्थिक मानकों के हिसाब से यह एक गरीब इलाका है. लेकिन एक व्यक्ति की सूझबूझ और अग्रणी सोच की वजह से इस जिले की पूरे भारत में चर्चा हो रही है. नंदुरबार के कलेक्टर डॉक्टर राजेंद्र भरुद ने वर्ष 2020 में इस बात का अंदाजा लगा लिया था कि अगर कोरोना वायरस की दूसरी लहर आई तो एक गरीब जिले के लोगों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ सकती है.  डॉक्टर भरुद ने सितंबर 2020 में एक ऑक्सीजन प्लांट लगवाया और 2021 में दो और ऑक्सीजन प्लांट लगवाए. बताया जाता है कि इन प्लांट की कुल लागत 80 लाख रुपए आई.

आज स्थिति यह है कि न सिर्फ महाराष्ट्र बल्कि गुजरात से भी कई लोग ऑक्सीजन के लिए नंदुरबार आ रहे हैं. देश में वैसे लोग भी हैं जो वेंटीलेटर को स्टोर रूम से बाहर तक नहीं निकालते. देश में वैसे राज्य भी हैं जहां केंद्र सरकार द्वारा फंड देने के बाद भी ऑक्सीजन का प्लांट इसलिए नहीं लगाया जा सका क्योंकि सरकार ने उसके लिए साइट क्लियरेंस नहीं दिया.

अब जबकि पूरा देश विकराल आपातकाल से गुजर रहा है, जहां हर नागरिक को चौकन्ना रहने की जरूरत है. आम लोगों के साथ-साथ, पार्षद, जिलाधिकारी, विधायक, सांसद, राज्य सरकारों से लेकर केंद्र तक, सबको मिलकर काम करना होगा, तभी इस महामारी और आपदा से हम बाहर निकाल सकेंगे. यह समय नहीं है कि हम गलतियां गिनाएं.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

ब्लॉगर के बारे में

ब्रज मोहन सिंहएडिटर, इनपुट, न्यूज 18 बिहार-झारखंड

पत्रकारिता में 22 वर्ष का अनुभव. राष्ट्रीय राजधानी, पंजाब , हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में रिपोर्टिंग की.एनडीटीवी, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका और पीटीसी न्यूज में संपादकीय पदों पर रहे. न्यूज़ 18 से पहले इटीवी भारत में रीजनल एडिटर थे. कृषि, ग्रामीण विकास और पब्लिक पॉलिसी में दिलचस्पी.

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