Wednesday, June 17

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यूपी एसआईआर: ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में महिलाओं के नाम अधिक कटे, सियासी समीकरण बदलने की आशंका ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक असर, पुरुषों के मुकाबले 10 फीसदी अधिक महिलाएं लिस्ट से बाहर

 

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में हाल ही में जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के प्रकाशन के बाद से एक नई सियासी चर्चा ने जन्म लिया है। इस बार वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक रही है, जिससे प्रदेश की राजनीति में बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।

 

6 जनवरी को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने राज्य की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की थी, जिसमें कुल 2.89 करोड़ वोटरों के नाम कटे थे। हालांकि, जब रिणवा से इस बारे में जेंडर रेशियो पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने इस पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की, और बाद में इस आंकड़े के विश्लेषण का आश्वासन दिया। तीन दिन बीत जाने के बावजूद आयोग ने इस मुद्दे पर कोई स्थिति स्पष्ट नहीं की है।

 

महिलाओं के नाम अधिक कटने का रुझान

 

राज्य के कई जिलों में महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से अधिक कटे हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर ज्यादा देखने को मिला है। उदाहरण के लिए, कुशीनगर जिले में 2.20 लाख पुरुषों और 2.82 लाख महिलाओं के नाम कटे हैं, जबकि बलरामपुर जिले में 1.88 लाख पुरुषों और 2.23 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो गए हैं। यहां महिला वोटरों की हिस्सेदारी पहले 46 फीसदी थी, जो अब घटकर लगभग 43 फीसदी रह गई है।

 

शाहजहांपुर जिले में भी यह अंतर बढ़ा है, जहां एसआईआर से पहले पुरुषों की तुलना में 1.71 लाख महिलाएं कम थीं, वहीं अब यह अंतर बढ़कर 2.05 लाख हो गया है। सूत्रों का कहना है कि यह ट्रेंड खासकर पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में अधिक देखा गया है।

 

शिफ्टिंग का असर

 

इस बदलाव का प्रमुख कारण माना जा रहा है कि शादी के बाद महिलाओं के पते में बदलाव होता है, जिसके कारण उनके नाम वोटर लिस्ट में कट जाते हैं। 2003 की वोटर लिस्ट में माता-पिता का विवरण देने की आवश्यकता के कारण कई महिलाओं के नाम छूट गए। हालांकि, निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों ने दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के दौरान वोटरों को जोड़ने की कोशिश की है।

 

सियासी समीकरण पर असर

 

यदि जेंडर रेशियो में यह अंतर और बढ़ता है, तो राज्य के राजनीतिक समीकरण पर इसका असर साफ दिखाई देगा। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला वोटरों की कमी से विशेषकर ग्रामीण इलाकों में सियासी पंक्तियां प्रभावित हो सकती हैं।

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