Thursday, May 14

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मृत्यु या विनाश…अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाना भी हिंसा, सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाया UAPA का दायरा रिपोर्टेड बाय: दिनेश मिश्र | नवभारतटाइम्स

 

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगे के मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इन आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत अपराध करने का आरोप है। हालांकि, अदालत ने अन्य पांच आरोपियों — गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम खान — को जमानत दे दी।

 

 

 

अलग-अलग जमानत की समीक्षा

 

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की युगलपीठ ने कहा कि हर आरोपी की जमानत याचिका अलग-अलग जांच की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं।

 

 

 

यूएपीए की बड़ी व्याख्या

 

सुप्रीम कोर्ट ने UAPA की धारा 43डी(5) की व्याख्या करते हुए कहा कि मृत्यु, विनाश या अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाना भी हिंसा की श्रेणी में आता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मुकदमे की सुनवाई में देरी को ‘ट्रंप कार्ड’ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जो स्वतः वैधानिक सुरक्षा उपायों को रद्द कर दे।

 

 

 

जमानत पर शर्तें

 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम संरक्षित गवाहों की जांच के बाद या एक वर्ष के अंतराल के बाद जमानत के लिए पुनः याचिका दाखिल कर सकते हैं। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष की सामग्री से पता चलता है कि दोनों आरोपी घटनास्थलीय कार्यों से परे योजना, लामबंदी और रणनीतिक स्तर पर संलिप्त हैं।

 

 

 

न्यायिक जांच और बचाव पक्ष

 

अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत चरण में बचाव पक्ष के तर्कों की जाँच नहीं की जाएगी। न्यायिक जांच आरोपी-विशिष्ट होती है और UAPA की धारा 43डी(5 प्रथम दृष्टया मामले की पुष्टि के लिए न्यायिक जांच को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करती।

 

 

 

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने UAPA का दायरा बढ़ाया और स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह शारीरिक हो या आर्थिक, कानून के तहत गंभीर अपराध मानी जाएगी।

 

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