Saturday, January 3

अंतरिक्ष में टकराव से बचाव: एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट पृथ्वी के करीब लाने की तैयारी

 

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नई दिल्ली। सैटेलाइट इंटरनेट क्षेत्र की दिग्गज कंपनी स्टारलिंक इस साल यानी 2026 में अपने सैटेलाइटों को पृथ्वी के नजदीक लाने की तैयारी कर रही है। कंपनी का यह कदम अंतरिक्ष में टकराव के खतरे को कम करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।

 

लो-अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइटों की ऊंचाई घटेगी

 

अभी स्टारलिंक सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 550 किलोमीटर की ऊंचाई पर कक्षा में हैं। कंपनी इनकी ऊंचाई घटाकर लगभग 480 किलोमीटर करने जा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि अंतरिक्ष में सैटेलाइटों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इससे टकराव का खतरा बढ़ गया है। नीचे की ओर कम सैटेलाइट होने के कारण इस नई ऊंचाई पर सुरक्षा बढ़ जाएगी।

 

टकराव का खतरा और समाधान

 

इंटरेस्टिंग इंजीनियरिंग की रिपोर्ट के अनुसार, सैटेलाइटों को पृथ्वी के करीब लाने से उनकी सुरक्षा बढ़ेगी और टकराव की संभावना कम होगी। याद रहे कि पिछले महीने एक स्टारलिंक सैटेलाइट में खराबी के कारण उसका संपर्क टूट गया और वह नष्ट हो गया था। स्टारलिंक की पैरंट कंपनी स्पेसएक्स का कहना है कि इस कदम के तहत सैटेलाइटों को धीरे-धीरे नीचे लाने का काम पूरे साल चलेगा।

 

कम ऊंचाई का अतिरिक्त फायदा

 

सैटेलाइट को कम ऊंचाई पर रखने का एक और फायदा यह है कि अपनी आयु पूरी करने के बाद वे जल्दी पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर जलकर समाप्त हो जाते हैं। इससे अंतरिक्ष में बेकार सैटेलाइटों के लंबे समय तक चक्कर लगाने की समस्या खत्म हो जाती है और नए सैटेलाइटों के लिए जगह बनती है।

 

भारत में स्टारलिंक की सेवा

 

एलन मस्क की कंपनी भारत में भी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। 2026 में यह सेवा शुरू होने की उम्मीद है। स्टारलिंक को इसके लिए भारतीय सरकार से मंजूरी मिल चुकी है और कुछ तकनीकी काम बाकी हैं।

 

अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य

 

दुनियाभर में कई कंपनियां लो-अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट भेज रही हैं। अकेले स्टारलिंक का लक्ष्य 10,000 सैटेलाइटों का नेटवर्क तैयार करना है। इसके साथ ही वनवेब, अमेज़न कुइपर जैसी कंपनियां भी इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा सैटेलाइट लॉंच कर स्टारलिंक दुनिया का सबसे बड़ा ऑपरेटर बन चुका है।

 

निष्कर्ष:

एलन मस्क का यह कदम न केवल अंतरिक्ष में टकराव की आशंका को कम करेगा, बल्कि सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को और सुरक्षित और भरोसेमंद बनाएगा। कम ऊंचाई पर सैटेलाइट का होना भविष्य में अंतरिक्ष संचालन के लिए भी लाभकारी साबित होगा।

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