बिहार में घुट रही है ‘पिंजरे वाली मुनियों’ की सांसें


तीन रोज पहले जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट और डॉक्यूमेंटरी फिल्ममेकर नीरज प्रियदर्शी ने एक वीडियो को ट्विटर पर साझा किया. इस वीडियो में एक पिंजरेनुमा गाड़ी में कुछ लड़कियां अश्लील गानों पर वल्गर डांस कर रही थीं और उसके आसपास लोगों का हुजूम उत्तेजित होकर झूम रहा था. यह वीडियो बिहार के भोजपुर जिले के कोइलवर के पास का था, जो राजधानी पटना से सिर्फ 40 किमी दूर है. इस ट्वीट के साथ उन्होंने लिखा कि ये डांसर चार हजार रुपये रोजाना की दर से बिहार के ही मुजफ्फरपुर जिले से लायी गयी थीं. उन्होंने अपने जीवन में इससे अधिक भयानक दृश्य नहीं देखा. उनका यह वीडियो बहुत जल्द सोशल मीडिया प्लेटफॉम पर वायरल हो गया.

उनकी बात बिल्कुल सही है. इस कोरोना काल में जब लोगों के लिए अपनी जान बचाना सबसे जरूरी काम है. आधुनिकता के इस दौर में जब इंसान की आजादी ही सबसे जरूरी विचार है. इस दौर में लड़कियों को पिंजरे में बंद करके नचाना, इसे मध्ययुगीन बर्बरता के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता. मगर दुखद है कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे वाले इस राज्य बिहार में ऐसे दृश्य बहुत आम हैं और पिछले एक दशक से हर शादी के मौके पर देखे जाते हैं. कोइलवर ही नहीं, राजधानी पटना में भी ऐसे दृश्य सहज ही दिख जाते हैं. भीषण ठंड में भी इन पिंजरों में बहुत कम कपड़ों के साथ नाचती ये डांसर किसी सेक्स स्लेव जैसी ही मालूम होती हैं.

नीरज प्रियदर्शी जी के इस वीडियो को देखकर सहज ही तीसरी कसम का वह गीत याद आ जाता है, जो इसी भोजपुर इलाके के रहने वाले और बॉलीवुड के सबसे सहज और सबसे सफल गीतकार शैलेंद्र ने लिखा था- चलत मुसाफिर मोह लिया रे, पिंजरे वाली मुनिया. इस गीत की देसज धुन की वजह से इसे अलग ही प्रसिद्धि मिली थी. मैं भी इसे अब तक सहज भाव से सुनता रहा था. मगर इस वीडियो को देखकर तीसरी कसम फिल्म का वह गीत सहज ही कनेक्ट हो गया. क्या शैलेंद्र ने इसी तरह के भाव को प्रतिध्वनित करने के लिए यह गीत लिखा था, पिंजरे वाली मुनिया. या फिर उन्होंने किसी पापुलर भोजपुरी गीत का मुखरा उठा लिया था और उससे गीत रच दिया.

भोजपुरिया समाज में शादी-ब्याह और खुशी के दूसरे मौकों पर नचनियों को नचाने का रिवाज काफी पुराना है. पहले ऐसे मौकों पर बाईजी को बुलाया जाता था, अब ऑर्केस्ट्रा डांसरों को बुलाया जाता है. इनका काम सिर्फ यौन उद्दीपन होता है. परिवार के पुरुष इनके साथ अश्लील भावनाएं व्यक्त करते हुए झूमते नाचते हैं और परिवार की महिलाएं भी अक्सर इन दृश्यों को सहज भाव से देखा करती हैं. भोजपुरी समाज के लिए यह प्रचलन बहुत आम है. इसके बिना हुई शादी को शादी नहीं माना जाता.

मगर यौन उद्दीपन और सहज फूहड़ मनोरंजन के नाम पर जिन लड़कियों को नचाया जाता है, उनका जीवन बहुत सहज नहीं होता. अक्सर नाच के दौरान इनके साथ छेड़छाड़ होती है, अश्लील हरकतें होती हैं और नाच के बाद इनके साथ जबरन यौन संबंध बनाने की कोशिशें भी बहुत आम होती हैं. नाच के दौरान अक्सर गोलियां चलती हैं और कई दफा ये बेकसूर लड़कियां यौन उद्दीपन में पागल हुए लोगों की गोलियों का शिकार हो जाती हैं. शादी ब्याह के मौसम में इन डांसरों को गोली लगने की घटनाएं हमेशा बिहार के अखबारों में सहजता से मिल जाती हैं.

ये लड़कियां अमूमन पश्चिम बंगाल, नेपाल और यूपी के इलाकों से खरीदकर, तस्करी करके और शादी के नाम पर बहलाकर लायी जाती हैं. इनमें अमूमन 40 से 50 फीसदी नाबालिग होती हैं. पूरे भोजपुर इलाके में सैकड़ों ऑर्केस्ट्रा कंपनियां कुटीर उद्योग की तरह संचालित होती हैं, ये दस हजार से पचीस हजार रुपये नाइट के हिसाब से इन डांसरों की सेवाएं उपलब्ध कराती हैं और बदले में अमूमन इनके साथ कई तरह के हरकतों की छूट रहती है.

आर्केस्ट्रा संचालक भी इन लड़कियों के साथ शोषण करने में पीछे नहीं रहते. अगर सीजन मंदा रहा तो इनसे बाद में वेश्यावृत्ति तक कराते हैं. सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी और मुजफ्फरपुर जिले के छोटे-छोटे कस्बों में ऐसे ग्रुप खूब नजर आते हैं. जिनमें हमेशा सैकड़ों लड़कियों, किशोरियों का जीवन पिसता रहता है. बदले में उन्हें कुछ हजार रुपये मिलते हैं, जो उनके परिजनों के हाथ आते हैं. इनके हिस्से में अर्ध वेश्यावृत्ति का जीवन आता है. यही तो है इन पिंजरे वाली मुनियों की कहानी.

दुखद तो यह है कि भोजपुरी के समाज में अमूमन इस बात को खराब नहीं माना जाता. अच्छे खासे पढ़े-लिखे परिवार के लोग भी इन डांसरों से अश्लील नाच करवाने को खराब नहीं मानते. देखा-देखी अब इन इलाकों के नेता भी चुनाव प्रचार और दूसरे आयोजनों में इन डांसरों को नचाने लगे हैं. ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें नेताजी इन लड़कियों के साथ अश्लील हरकतें करते और ठुमके लगाते नजर आते हैं.

यह एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसके प्रति सरकार और प्रशासन ने भी आंखें फेर रखी हैं. न डांसरों की हत्या के मामलों में भी अब तक कहीं ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. न इन्हें काम करवाने वाले ऑर्केस्ट्रा संचालकों पर नाबालिग लड़कियों की ट्रैफिकिंग का मुकदमा दर्ज हुआ है. नीज प्रियदर्शी ने जो एक बार देखा वह बिहार के बड़े हिस्से का कड़वा सच है और सबकी सहमति से निरंतर जारी है. बस इनके बीच पिंजरे वाली मुनियों की सांसें घुट रही हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

पुष्यमित्रलेखक एवं पत्रकार

स्वतंत्र पत्रकार व लेखक. विभिन्न अखबारों में 15 साल काम किया है. ‘रुकतापुर’ समेत कई किताबें लिख चुके हैं. समाज, राजनीति और संस्कृति पर पढ़ने-लिखने में रुचि.

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