
पटना: बिहार में शराबबंदी को लेकर राजनीतिक घमासान फिर से जोर पकड़ता दिख रहा है। इस बार चर्चा में तीव्रता इसलिए है क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सहयोगी दल ही इस बंदी को हटाने या समीक्षा करने की मांग कर रहे हैं।
सामाजिक सुधार बनाम आर्थिक दबाव
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि शराबबंदी का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सुधार और महिलाओं की सुरक्षा है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, शराबबंदी के कारण घरेलू हिंसा और पारिवारिक झगड़ों में लगभग 12 से 18 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई।
नीतीश कुमार का दावा है कि शराबबंदी से गरीबों और महिलाओं के जीवन में सुधार हुआ है, जबकि राजस्व का नुकसान एक छोटा मूल्य है।
सहयोगी दलों का विरोध
हालांकि, एनडीए के तीन सहयोगी दल इस बंदी के विरोध में हैं। उनका कहना है कि शराबबंदी आर्थिक बोझ है और प्रशासन का दुरुपयोग कर रही है।
हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर के संस्थापक अध्यक्ष जीतनराम मांझी का कहना है कि शराबबंदी के कारण मुसहर समुदाय की जिंदगी प्रभावित हुई है। गरीब और पिछड़े लोग देसी शराब बनाने और बेचने में फंसे हैं, जबकि बड़े तस्कर बच निकलते हैं।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान का सुझाव है कि सीमित और नियंत्रित शराब बिक्री से राजस्व भी बढ़ेगा और अवैध कारोबार पर लगाम लगेगा। उनका मानना है कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में शराब उपलब्ध है और तस्करों ने एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है।
जागरूकता अभियान बनाम कानून
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के मधुबनी से विधायक आनंद का कहना है कि शराबबंदी की तुलना में शराब सेवन के खिलाफ जागरूकता अभियान ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। उनका कहना है कि कानून का होना आवश्यक है, लेकिन इसे लागू करने से राज्य को राजस्व का बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
बिहार में शराबबंदी का मामला केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। इसके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक पहलू ने इसे बहस का केंद्र बना दिया है। सहयोगी दलों की मांग और विरोध के चलते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने यह सियासी चुनौती अब और बढ़ गई है।
