
नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026 – भारत-पाकिस्तान संबंध पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं। इस बीच पाकिस्तान 2026 में सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर एक नई इस्लामी सैन्य तिकड़ी बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसे विशेषज्ञ ‘इस्लामी नाटो’ कह रहे हैं। यह गठजोड़ भारत के लिए गंभीर रणनीतिक चिंता का कारण बन सकता है।
वहीं, भारत को ग्रीस, साइप्रस और इजरायल के साथ एक नए ‘3+1 क्वॉड’ में शामिल होने का न्यौता मिला है। यह गठजोड़ रक्षा, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी और आर्थिक सहयोग पर केंद्रित है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत के शामिल होने से यह नई त्रिपक्षीय संरचना पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की गठजोड़ की योजनाओं पर पानी फेर सकती है।
पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की गठजोड़
यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की इस नई तिकड़ी में सऊदी अरब का वित्तीय समर्थन, तुर्की की प्रौद्योगिकी और पाकिस्तान की सैन्य एवं परमाणु क्षमताएँ शामिल हैं। इस गठजोड़ का मकसद दक्षिण और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदलना और समुद्री सुरक्षा को प्रभावित करना है।
भारत का रणनीतिक विकल्प
भारत कई विकल्पों पर विचार कर रहा है:
इजरायल और अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना
तुर्की के पड़ोसी देशों ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ संबंध बढ़ाना
समुद्री निगरानी बढ़ाना और घरेलू रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना
सऊदी अरब और UAE के आर्थिक प्रभाव का लाभ उठाना
‘3+1 क्वॉड’ की अहमियत
ग्रीस, साइप्रस और इजरायल ने दिसंबर 2025 में त्रिपक्षीय सैन्य सहयोग योजना पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य संयुक्त वायु और नौसैनिक अभ्यास, रणनीतिक संवाद, मानवरहित प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रशिक्षण साझा करना है। भारत को इस मंच में शामिल होने का औपचारिक न्यौता मिला है, जिससे यह नई क्वॉड पाकिस्तान-संबंधी रणनीतियों का काउंटर बन सकती है।
भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि
तुर्की इस्लामी दुनिया का नेतृत्व करना चाहता है और पाक-सऊदी गठजोड़ में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा अज़रबैजान और बांग्लादेश जैसे देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं। सऊदी अरब आर्थिक मदद के माध्यम से पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है, जबकि अमेरिका पाकिस्तान पर नजर रख रहा है, मुख्य रूप से ईरान और चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ‘3+1 क्वॉड’ भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम साबित हो सकता है, क्योंकि यह न केवल पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को सीमित करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक मंचों पर मजबूत स्थिति देगा।