Tuesday, January 13

दरभंगा राज की अंतिम महारानी: एक युग का अवसान, राष्ट्र के लिए अमिट विरासत

 

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दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही न केवल मिथिला की राजशाही परंपरा का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया, बल्कि भारतीय इतिहास के उस दौर की अंतिम जीवित कड़ी भी टूट गई, जिसका सीधा संबंध संविधान सभा से था। वे महाराज कामेश्वर सिंह की पत्नी थीं, जो 1947 से 1950 तक संविधान सभा के सदस्य रहे और संविधान के मूल रजिस्टर पर ‘दरभंगा’ का नाम अंकित करने का गौरव प्राप्त किया।

 

महारानी कामसुंदरी देवी संविधान सभा के 284 सदस्यों की पत्नियों में अंतिम जीवित सदस्य थीं। उनके निधन के साथ ही भारतीय राजशाही की वह आखिरी निशानी भी इतिहास बन गई, जिसने राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया।

 

 

दरभंगा राज का अतुलनीय दान और राष्ट्र सेवा

 

दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी कामसुंदरी देवी का योगदान केवल मिथिला तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी दानशीलता और राष्ट्रभक्ति ने पूरे देश को लाभान्वित किया।

 

दिल्ली स्थित दरभंगा हाउस, जिसे राजपरिवार ने दान किया, आज देश की राजधानी में खुफिया ब्यूरो (IB) का मुख्यालय है।

दरभंगा का नरगौना पैलेस ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को दान किया गया, जहां आज विश्वविद्यालय का पीजी विभाग संचालित होता है। यह भवन अपने समय में भूकंपरोधी तकनीक, एयर कंडीशनिंग और लिफ्ट जैसी आधुनिक सुविधाओं से युक्त था।

 

 

युद्धकाल में देश के लिए विमान और स्वर्ण दान

 

साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान महाराज कामेश्वर सिंह ने राष्ट्र के प्रति अद्वितीय समर्पण का परिचय देते हुए—

 

तीन विमान

600 किलोग्राम सोना

तथा दरभंगा में निर्मित 90 एकड़ का एयरपोर्ट

सरकार को दान कर दिया।

 

इसके अतिरिक्त उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) को 50 लाख रुपये का दान दिया और महान वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमन को शोध कार्य के लिए बहुमूल्य हीरा भेंट किया।

 

 

शिक्षा, संस्कृति और संस्कृत के संरक्षक

 

राजपरिवार ने प्राच्य विद्या के संरक्षण हेतु अपने आवास को दान कर कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई।

पटना में स्थित दरभंगा हाउस को पटना विश्वविद्यालय के लिए दान दिया गया, वहीं इलाहाबाद में भी विश्वविद्यालय निर्माण हेतु बड़ा योगदान दिया गया।

दरभंगा मेडिकल कॉलेज के लिए भूमि और भवन भी राजपरिवार की ही देन है।

 

 

रेलवे और संचार से बदली मिथिला की तस्वीर

 

वर्ष 1874 में राजपरिवार ने अपने निजी संसाधनों से तिरहुत रेलवे कंपनी की स्थापना की।

वाजितपुर से नरगौना तक 55 मील लंबा रेलखंड महज 62 दिनों में तैयार किया गया, जिससे क्षेत्र का आर्थिक और सामाजिक विकास हुआ और लोगों को गिरमिटिया मजदूर बनने से मुक्ति मिली।

 

 

संगीत और कला के महान संरक्षक

 

दरभंगा राज संगीत, कला और संस्कृति का भी प्रमुख केंद्र रहा।

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पद्मश्री रामचतुर मल्लिक जैसे महान कलाकार दरभंगा राज के दरबारी रहे।

 

 

इतिहास में अमर रहेगी दरभंगा राज की विरासत

 

महारानी कामसुंदरी देवी का निधन भले ही एक युग के अंत का प्रतीक हो, लेकिन दरभंगा राज द्वारा राष्ट्र, शिक्षा, संस्कृति और संविधान निर्माण में दिया गया योगदान भारत के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

 

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