Saturday, January 10

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा: पोक्सो में लाएं ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’, किशोर प्रेम संबंधों को कानून के शिकंजे से बचाया जाए

नई दिल्ली: बच्चों के यौन उत्पीड़न से संबंधित पोक्सो (POCSO) कानून के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है और केंद्र सरकार से कहा है कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ लाया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि असली किशोर प्रेम संबंध इस कानून के सख्त प्रावधानों के तहत फंसें नहीं।

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सुप्रीम कोर्ट की बेंच—जिसमें न्यायमूर्ति संजय कारोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह शामिल थे—ने यह निर्णय इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश को पलटते हुए सुनाया। कोर्ट ने कहा कि बार-बार देखा गया है कि पोक्सो कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि असली किशोर प्रेम संबंधों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानून में संशोधन करें।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट जमानत देते समय पीड़ित की उम्र का मेडिकल टेस्ट कराने का आदेश देना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 के तहत उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। कोर्ट ने कहा कि जमानत सुनवाई के दौरान ‘मिनी-ट्रायल’ या ऐसे प्रोटोकॉल लागू नहीं किए जा सकते जो मौजूदा कानूनों के खिलाफ हों। पीड़ित की उम्र का पता मुकदमे के दौरान लगाया जाना चाहिए, कि जमानत की सुनवाई में। दस्तावेजों की चुनौती उसी मुकदमे में दी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि पोक्सो कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए ‘न्याय की सबसे पवित्र अभिव्यक्ति’ है और इसे बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही, उन मामलों पर भी ध्यान दिया जाए जहाँ बदले की भावना से कानून का गलत इस्तेमाल किया जाता है।

यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनाया गया था, जिसमें हाई कोर्ट द्वारा जमानत देने के साथ पीड़ित की उम्र के मेडिकल टेस्ट कराने के निर्देश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया, लेकिन जमानत को बरकरार रखा।

 

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