
तेहरान/नई दिल्ली: ईरान में महंगाई और करेंसी गिरावट के विरोध में दो हफ्ते से जारी प्रदर्शन और बढ़ते राजनीतिक अस्थिरता के बीच ईरान के अंतिम शाह के बेटे और कथित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी का नाम चर्चा में है। रजा के समर्थकों ने प्रदर्शनकारियों के बीच “वापस आओ रजा” के नारे लगाए हैं।
रजा पहलवी 1978 में 17 साल की उम्र में पायलट ट्रेनिंग के लिए अमेरिका चले गए थे। इसी दौरान ईरान में राजशाही के खिलाफ बड़े प्रदर्शन शुरू हुए और 1979 में शाह को सत्ता छोड़नी पड़ी। तब से रजा विदेश में हैं। हालिया प्रदर्शनों में उन्होंने ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन को चुनौती देने और बदलाव की अपील की है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रजा पहलवी को ईरान में सामाजिक और राजनीतिक समर्थन केवल सीमित वर्ग से ही मिल रहा है। शाह के समर्थक पुराने राजशाही यादों में जी रहे हैं और रजा को इस वर्ग का समर्थन प्राप्त है, लेकिन व्यापक जन समर्थन नहीं है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिन मोदर्रेस के अनुसार, मौजूदा खामेनी शासन के रहते रजा कभी भी ईरान में कदम नहीं रख सकते। अगर भविष्य में शासन बदलता भी है, तो भी ईरानी सुरक्षा बल और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड उन्हें निशाना बना सकते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख भी इस मामले में अहम है। ट्रंप खामेनी शासन के विरोधी हैं और उन्होंने रजा को अच्छा माना है। हालांकि, उन्होंने रजा से सीधे मिलना उचित न होने का भी संकेत दिया, जिससे अमेरिका की समर्थन नीति में हिचकिचाहट दिखाई देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रजा पहलवी की ईरान वापसी इतनी आसान नहीं होगी, जितना सोशल मीडिया पर दिखाई देता है।