पदक और मैचों से आगे — भारत को खेल को “विकास का आधार” मानना होगा, “मनोरंजन” नहीं
दशकों से भारत में खेलों को एक वैकल्पिक क्षेत्र के रूप में देखा गया है — जिसे चाहो तो अपनाओ, वरना जीवन में जरूरी नहीं। लेकिन आज खेल केवल मैदानों तक सीमित नहीं हैं। ये स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, सामाजिक एकता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा से सीधे जुड़े हैं।खेलों को राष्ट्रीय विकास के स्तंभ के रूप में मान्यता देना अब केवल खिलाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य हो गया है।अब समय है कि नीति, शासन और समाज मिलकर इस दृष्टिकोण को संस्थागत रूप दें।
🔹 मनोरंजन से राष्ट्र निर्माण तक
भारत जैसे विशाल और युवा देश में खेलों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं माना जा सकता। खेल अनुशासन, आत्मविश्वास, टीम भावना और धैर्य सिखाते हैं — जो एक मजबूत समाज की नींव हैं।फिर भी, भारत में खेलों को अब भी “ऐच्छिक” समझा जाता है। राष्ट्रीय बजट में इसका हिस्सा नगण्य है, शिक्षा में इसका स्थान सीम...






