Friday, May 15

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दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सात फेरे न होने पर भी हिंदू विवाह रहेगा वैध

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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के तहत सप्तपदी (सात फेरे) की रस्म को लेकर एक दूरगामी और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी हिंदू विवाह में सप्तपदी पूरी न होने पर भी वह अमान्य नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि सप्तपदी कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अभाव विवाह की वैधता को प्रभावित नहीं करता।

🔹 महिला की दलील पर कोर्ट की मुहर

यह फैसला जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने सुनाया। मामले में पति ने दावा किया था कि वे बंजारा समुदाय (लंबाडा) से हैं और उनके मामले में हिंदू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता। अदालत ने इस आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि बंजारा समुदाय अब हिंदू रीति-रिवाजों को अपनाकर हिंदू व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है, इसलिए उनकी शादी भी HMA के दायरे में आती है।

🔹 सप्तपदी वाली दलील भी खारिज

शादी 1998 में हुई थी और दंपति का एक बच्चा भी है। पति ने दलील दी कि शादी लंबाडा परंपरा अनुसार हुई, जिसमें सप्तपदी पूरी नहीं हुई, इसलिए HMA लागू नहीं। कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया और कहा कि सप्तपदी की उपस्थिति हर हिंदू विवाह के वैध होने के लिए आवश्यक नहीं है।

🔹 फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा

दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले फैमिली कोर्ट के आदेश को भी बरकरार रखा, जिसमें महिला की तलाक याचिका हिंदू विवाह अधिनियम के तहत सुनवाई योग्य मानी गई थी। अदालत ने महिला द्वारा प्रस्तुत विशेष साहित्य और एथ्नोग्राफिक अध्ययन के हवाले से भी फैसले का समर्थन किया।

🔹 कोर्ट का स्पष्ट संदेश

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा:
“अधिनियम सप्तपदी को कानूनी मान्यता देता है, लेकिन यह प्रत्येक हिंदू विवाह को मान्य कराने के लिए आवश्यक नहीं है। यदि सप्तपदी के होने का सीधा सबूत न भी मिले, तो भी शादी वैध मानी जाएगी।”

निष्कर्ष:
इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि हिंदू विवाह की वैधता सिर्फ सप्तपदी पर निर्भर नहीं करती, और अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की व्यापक व्याख्या करते हुए वास्तविक विवाह और पारिवारिक संबंधों की रक्षा सुनिश्चित की है।

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