Wednesday, June 3

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मुस्लिम अफसर मंदिर जाते हैं, हिंदू अधिकारी गुरुद्वारे… सुप्रीम कोर्ट ने सेना की धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रखा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐसा आदेश पारित किया है, जो सेना के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को मजबूती से रेखांकित करता है। CJI सूर्यकांत की पीठ ने हाल ही में एक ईसाई अधिकारी सैमुअल कमलेसन की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि सेना में सभी धर्मों का समान सम्मान किया जाता है और अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे अपने सैनिकों के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लें।

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क्या था मामला:
सेना के अधिकारी सैमुअल कमलेसन ने अपनी रेजिमेंट के नियमित धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने से इनकार किया। उनका कहना था कि ईसाई होने के नाते यह उनकी आस्था के खिलाफ है। अधिकारियों का कहना है कि सेना में बहु-धार्मिक अनुष्ठान नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं और ‘सर्व धर्म स्थल’ या बहु-धार्मिक मंदिर सेना की यूनिट्स का अभिन्न अंग हैं।

पूर्व सेना अधिकारियों की प्रतिक्रिया:
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने कहा, “हम सभी धर्मों के प्रति समान नजरिया रखते हैं। हमारे लिए सैनिक का धर्म ही हमारा धर्म है। इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने धर्म का पालन नहीं करते। यह मामला असाधारण है।”

पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रि.) के अनुसार, सेना के दो मूल सिद्धांत हैं – धर्मनिरपेक्षता और गैर-राजनीतिकता। उन्होंने कहा, “सेना में विविध धर्मों का सम्मान करना और रेजिमेंटल अनुष्ठानों में भाग लेना धर्मनिरपेक्षता का परिष्कृत और प्रभावी रूप है। सेना वर्दी में एकजुट रहती है और यही हमारी धर्मनिरपेक्षता है।”

सेना की धर्मनिरपेक्ष परंपरा:
सैनिकों और अधिकारियों के बीच यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है। हिंदू अधिकारी गुरुद्वारे जाते हैं, मुस्लिम अफसर मस्जिदों में जाते हैं और ईसाई अधिकारी चर्च में। फील्ड मार्शल मानेकशॉ के उदाहरण को देखें – उन्होंने सैनिकों द्वारा दिए गए उपनाम ‘सैम बहादुर’ को स्वीकार किया, जो सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश:
CJI सूर्यकांत ने कहा कि आर्मी ऑफिसर का यह रवैया अनुशासनहीनता का उदाहरण है। “आप अपने जवानों की भावनाओं का सम्मान करने में नाकाम रहे। धार्मिक अहंकार इतना अधिक है कि दूसरों की परवाह नहीं की गई। यह सेना में अनुशासन के खिलाफ है।”

निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सेना की धर्मनिरपेक्षता और अनुशासन को लेकर मिसाल है। यह स्पष्ट करता है कि सेना में व्यक्तिगत धार्मिक आस्था के बावजूद सभी अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे अपने सैनिकों की आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करें।

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