Tuesday, February 24

‘बेटे का अंतिम संस्कार मां का मौलिक अधिकार’: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली, 24 फरवरी 2026। क्या किसी मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार उसके धर्म और रीति-रिवाजों के अनुसार करना उसके परिजनों का मौलिक अधिकार है? यह संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रश्न देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष आया है।

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Supreme Court of India ने उत्तर प्रदेश की एक मां की याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर 16 मार्च तक जवाब तलब किया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि “बेटे का अंतिम संस्कार करना मां का मौलिक अधिकार है।”

दुबई में मौत, बिना परिजनों की अनुमति हुआ अंतिम संस्कार

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की 57 वर्षीय सावित्री ने शीर्ष अदालत में गुहार लगाई है कि उनके 29 वर्षीय बेटे पंकज की मौत संयुक्त अरब अमीरात में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई और परिवार को अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में शामिल होने का अवसर नहीं दिया गया।

पंकज पिछले दो वर्षों से Sharjah स्थित एक निजी कंपनी में कारपेंटर के रूप में कार्यरत था। दो दिसंबर से उसके लापता होने के बाद परिवार ने 10 जनवरी को बस्ती पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

याचिका के अनुसार, 4 फरवरी को Embassy of India, Abu Dhabi से फोन पर सूचना दी गई कि पंकज की मृत्यु हो चुकी है और उसका अंतिम संस्कार दुबई में ही कर दिया गया है।

‘अंतिम संस्कार संस्कार है, विकल्प नहीं’

मां की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय एम. नूली ने न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष दलील दी कि अंतिम संस्कार केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कार है।

उन्होंने तर्क रखा कि मां को अपने बेटे के अंतिम संस्कार का अधिकार न देना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।

वकील ने कहा, “अंतिम संस्कार का अधिकार छीनना न केवल मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि मानवीय गरिमा के भी विपरीत है।”

संवैधानिक प्रश्न पर व्यापक बहस

यह मामला अब एक व्यापक संवैधानिक विमर्श का रूप लेता दिख रहा है—क्या मृतक की धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है? और यदि मृत्यु विदेश में हो, तो क्या भारतीय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार बाध्य है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र से जवाब तलब किए जाने के बाद इस मुद्दे पर कानूनी, नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण से बहस तेज होने की संभावना है।

16 मार्च को अगली सुनवाई

अदालत ने केंद्र सरकार को 16 मार्च तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर साबित हो सकता है, जहां विदेश में हुई मौतों के बाद अंतिम संस्कार को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।

फिलहाल, एक मां की पुकार ने देश की सर्वोच्च अदालत को यह तय करने की चुनौती दी है कि क्या अंतिम विदाई का अधिकार भी मौलिक अधिकारों की परिधि में आता है।

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