Saturday, February 21

10वीं पास नहीं, 18 घंटे मजदूरी और अब 70 करोड़ का कारोबार: श्रीकांत ने बदल दी फ्लोरिकल्चर की दुनिया

नई दिल्ली। तेलंगाना के छोटे से गांव बोल्लापल्ली से निकलकर बेंगलुरु तक का सफर तय करने वाले श्रीकांत ने अपनी मेहनत और जुझारूपन से फ्लोरिकल्चर उद्योग में मिसाल कायम की है। 10वीं कक्षा में ड्रॉपआउट श्रीकांत ने दिन में 18 घंटे मजदूरी की और अब उनकी कंपनी वेनसाईं फ्लोरिटेक सालाना 70 करोड़ रुपये का टर्नओवर करती है। उन्हें साउथ इंडिया का ‘फ्लावर किंग’ कहा जाता है।

This slideshow requires JavaScript.

संघर्ष और शुरुआत

श्रीकांत के परिवार पर भारी कर्ज था, इसलिए 16 साल की उम्र में स्कूल छोड़कर वह बेंगलुरु चले गए। 1995 में उन्होंने एक फूल के खेत में 1,000 रुपये महीने पर काम करना शुरू किया। वहां उन्होंने फूलों की खेती के साथ मार्केटिंग और बिक्री के गुर भी सीखे। दो साल बाद उन्होंने दोस्तों और अपनी बचत से 20,000 रुपये निवेश करके ‘ओम श्री साईं फ्लावर्स’ नाम से दुकान खोली, और पहले ही साल 5 लाख रुपये का टर्नओवर किया।

कंपनी की नींव और इनोवेशन

2005 में श्रीकांत ने अपनी कंपनी वेनसाईं फ्लोरिटेक की स्थापना की। बेंगलुरु के पास 70 एकड़ हाई-टेक फार्म पर गुलाब, जरबेरा, कार्नेशन जैसी 20 से अधिक किस्में उगाई जाती हैं। पॉलीहाउस में तापमान और नमी नियंत्रित करके फूलों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है। डच ब्रीडर ने श्रीकांत की बेटी के नाम पर ‘मोक्ष श्री’ नाम की जरबेरा किस्म पेटेंट कर सम्मानित की।

अंतरराष्ट्रीय कारोबार और पर्यावरण अभियान

श्रीकांत के फूल अब केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। उनके उत्पाद दुबई, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में निर्यात किए जाते हैं। कंपनी ने कोल्ड-चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है ताकि फूल ताजगी के साथ पहुंचें। घरेलू बाजार में लग्जरी होटलों और हाई-प्रोफाइल इवेंट्स को सप्लाई दी जाती है। श्रीकांत ग्रोअर्स फ्लावर काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के रूप में प्लास्टिक फूलों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं और सौर ऊर्जा व कम रसायनों पर खेती करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

आज 300 से अधिक लोगों को रोजगार देने वाले श्रीकांत उन युवाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं।

Leave a Reply