
बांग्लादेश में हालिया चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। लंबे समय तक राजनीतिक अनिश्चितता और अंतरिम सरकार के कठिन दौर के बाद अब वहां निर्वाचित सरकार आई है। इस चुनाव में बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) को स्पष्ट जनादेश मिला है, जबकि अवामी लीग चुनावी प्रक्रिया से बाहर रही।
अतीत और नई उम्मीदें
चुनाव से पहले BNP के नेता तारिक रहमान ने भारत के प्रति सकारात्मक संदेश दिया। BNP यह समझती है कि बांग्लादेश की प्रगति भारत के साथ रचनात्मक संबंधों पर निर्भर है। हालांकि, 2001-2006 के BNP शासनकाल में उनकी मां खालिदा जिया के नेतृत्व में भारत विरोधी कदम भी उठाए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि अतीत अपने आप को नहीं दोहराएगा, लेकिन नई सरकार के रुख की असली परीक्षा नीतिगत फैसलों से होगी।
आर्थिक और क्षेत्रीय दबाव
बांग्लादेश आर्थिक दबाव में है; उसका बाहरी कर्ज 100 अरब डॉलर से अधिक है और विदेशी मुद्रा भंडार पिछले चार साल में लगभग आधा रह गया है। ऐसे में क्षेत्रीय सहयोग, खासकर भारत के साथ, बेहद जरूरी है। भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुका है और पड़ोसी देशों के लिए विकास का बड़ा इंजन है।
घरेलू और वैचारिक संतुलन
BNP के लिए चुनौती यह है कि वह अपने चुनावी जनादेश और देश की आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाए। निवेशकों का भरोसा वापस लाना, बेरोजगारी से निपटना और अर्थव्यवस्था को स्थिर करना सीधे तौर पर भारत के साथ व्यापार और कनेक्टिविटी पर निर्भर हैं।
सावधानी और सहयोग की जरूरत
बांग्लादेश को किसी भी स्थिति में पाकिस्तान की भारत विरोधी साजिश में शामिल नहीं होना चाहिए। अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा भी दोनों देशों के रिश्तों पर प्रभाव डालती है। भारत की नीति स्थिरता और दीर्घकालिक हितों पर आधारित रहती है, और नए दौर में सीमा-पार सुरक्षा, कट्टरपंथ रोकने के प्रयास और रीजनल कनेक्टिविटी अहम बने रहेंगे।
अतः बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री की असली परीक्षा यह होगी कि क्या वे भारत के साथ संतुलित और रचनात्मक संबंध कायम कर देश में स्थिरता ला पाएंगे, या राजनीतिक दबावों के बीच बिखराव की स्थिति सामने आएगी।
