Monday, February 16

जयपुर पोलो ग्राउंड में दर्दनाक हादसा: खेल के दौरान घोड़े को आया हार्ट अटैक, मैदान से बाहर निकलते ही गिरा, फिर लौटा 13 साल पुराना खौफ

जयपुर। गुलाबी नगरी जयपुर के ऐतिहासिक राजस्थान पोलो क्लब मैदान में रविवार को खेल का रोमांच उस समय मातम में बदल गया, जब प्रतिष्ठित ‘सिरमौर कप’ मुकाबले के दौरान एक घोड़े की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। यह हादसा 14 गोल के इस हाई-प्रोफाइल टूर्नामेंट के दौरान हुआ, जिसने खिलाड़ियों और दर्शकों को झकझोर कर रख दिया।

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मृतक घोड़ा कैरेसिल सुहाना टीम के खिलाड़ी कुलदीप सिंह राठौड़ का बताया जा रहा है। इस घटना ने पोलो खेल से जुड़े सुरक्षा मानकों और घोड़ों की चिकित्सा निगरानी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

चौथा चक्कर पूरा करते ही लड़खड़ाया घोड़ा, गिरते ही थम गई सांसें

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुलदीप सिंह राठौड़ का घोड़ा अपना चौथा चक्कर पूरा कर मैदान से बाहर निकलने ही वाला था, तभी अचानक वह लड़खड़ाया और देखते ही देखते जमीन पर गिर पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसकी हालत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया।

घटना के समय मैदान के दूसरे छोर पर पशु चिकित्सक डॉ. सुदामा गुप्ता जयपुर अरावली टीम के साथ मौजूद थे। सूचना मिलते ही वे दौड़कर मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक घोड़े की सांसें थम चुकी थीं।

एम्बुलेंस मौजूद थी, लेकिन विशेषज्ञ इलाज नहीं मिल सका

बताया गया कि मैदान पर एसडीएमएच की एम्बुलेंस तो मौजूद थी, लेकिन मानव डॉक्टरों ने पशु चिकित्सा विशेषज्ञता के अभाव में इलाज करने में असमर्थता जताई। इस वजह से समय पर इलाज संभव नहीं हो सका।

इसी सीजन में दूसरी बार घोड़े की मौत, चिंता बढ़ी

चौंकाने वाली बात यह है कि इसी पोलो सीजन में यह दूसरी घटना है, जब खेल के दौरान घोड़े की कार्डियक अरेस्ट से मौत हुई है। इससे पहले कोग्निवेरा पोलो कप के फाइनल मुकाबले में भी एक घोड़ा दिल का दौरा पड़ने से मर गया था। वह घोड़ा जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य और पोलो खिलाड़ी पद्मनाभ सिंह का था।

राजस्थान पोलो संघ के सचिव दिग्विजय सिंह ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि टूर्नामेंट से पहले सभी घोड़ों की स्वास्थ्य जांच की जाती है, इसके बावजूद ऐसी घटनाएं होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

घोड़ों को क्यों आता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट ने बताई वजह

विशेषज्ञों के अनुसार पोलो एक अत्यधिक तीव्रता वाला खेल है, जिसमें घोड़े को तेज दौड़ना, अचानक रुकना और दिशा बदलना पड़ता है। इस कारण कई बार घोड़े की हार्ट बीट तालमेल नहीं बैठा पाती और धड़कन अनियमित हो जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि 12 वर्ष से अधिक उम्र के घोड़ों में हार्ट अटैक का खतरा अधिक रहता है। यदि अटैक के तुरंत बाद डाइजोविसन इंजेक्शन दे दिया जाए, तो कुछ मामलों में जान बचाई जा सकती है।

कई बार इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन के कारण भी घोड़े गिर जाते हैं, लेकिन उसमें मृत्यु तुरंत नहीं होती। जबकि कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में मृत्यु कुछ ही क्षणों में हो सकती है।

13 साल पुराना दर्दनाक इतिहास फिर दोहराया गया

इस घटना ने जयपुर पोलो ग्राउंड के 13 साल पुराने भयावह इतिहास को भी फिर से ताजा कर दिया। 17 जनवरी 2013 को भवानी सिंह पोलो कप के दौरान भी एक ही दिन में दो घोड़ों की मौत हो गई थी। उस घटना के बाद लंबे समय तक पोलो खेल की सुरक्षा व्यवस्था पर बहस छिड़ी थी।

विशेषज्ञों के मुताबिक, पोलो और रेसिंग में ऐसे हादसों की दर भले ही 1 प्रतिशत से कम हो, लेकिन एक ही सीजन में दो घोड़ों की मौत खेल जगत के लिए बड़ा झटका और गंभीर चिंता का विषय है।

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