
भोपाल: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों, मदरसों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के सभी 6 छंदों का गायन अनिवार्य करने का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री ने इसे तुरंत लागू करने के निर्देश दिए।
मुख्यमंत्री बोले- राष्ट्रगीत में छुपी आजादी की ताकत
डॉ. मोहन यादव ने कहा, “वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता संग्राम में देशवासियों को ऊर्जा दी और हमारे शहीदों के संघर्ष की याद दिलाई। इसका गायन हर जगह होना चाहिए। यह निर्णय युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद से जोड़ने में मदद करेगा।”
कांग्रेस विधायक का विरोध- मजहबी आजादी पर अंकुश नहीं
कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इस फैसले का विरोध किया और कहा कि विवाद सम्मान का नहीं बल्कि मजहबी आजादी का है। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। मसूद ने कहा, “वंदे मातरम् के कुछ छंद हमारे मजहबी सिद्धांतों के खिलाफ हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस नए कानून का अध्ययन कर रहा है। जब तक बोर्ड अपनी राय नहीं देता, तब तक कोई निर्णय नहीं लिया जाएगा।”
शिक्षा मंत्री बोले- कानून सबके लिए बराबर
स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह ने कहा कि जो भी राष्ट्र का नागरिक है, उसे राष्ट्र के कानून का पालन करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे मदरसा हो या कोई अन्य स्कूल, सभी को वंदे मातरम् का गायन करना होगा। मंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम केवल किसी एक पार्टी का नहीं था और यह निर्णय युवा पीढ़ी में राष्ट्रभावना जगाने के लिए समय पर लिया गया।
विवाद का केंद्र- वंदे मातरम् के 6 छंद
आमतौर पर अब तक वंदे मातरम् का केवल पहला छंद ही गाया जाता था। लेकिन अब सरकार ने पूरे 6 छंदों को अनिवार्य किया। मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं का तर्क है कि बाद के छंदों में मातृभूमि की वंदना उनके धार्मिक सिद्धांतों (एकेश्वरवाद) के खिलाफ है। इसी कारण आरिफ मसूद और पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसे अध्ययन के लिए रखा है।
वंदे मातरम् की उत्पत्ति
राष्ट्रगीत वंदे मातरम् बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा और यह उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। पहली बार यह गीत 1882 में उनकी पत्रिका बंगदर्शन में छपा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे मंच पर गाया। ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है— हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
