
ढाका, 13 फरवरी 2026: बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने अभूतपूर्व जीत दर्ज की है, जिससे देश की राजनीतिक दिशा पूरी तरह बदल गई है। जमात-ए-इस्लामी, जिसे अमेरिका और ब्रिटेन की खुली मदद मिल रही थी, चुनाव में करारी हार का सामना कर गई। मोहम्मद यूनुस की मशीनरी भी इस बार नाकाम रही।
BNP की जीत के मायने
इस चुनाव में अवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी, इसलिए BNP ही मुख्यधारा की पार्टी के रूप में सामने आई। BNP को 300 संसदीय सीटों में से 200 से अधिक सीटों पर भारी बहुमत मिलने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब है कि जनता ने मध्यमार्गी और मुख्यधारा की राजनीति को ही अपना विकल्प माना है।
महिला वोटर्स ने जमात को नकारा
महिला वोटरों ने खुलकर BNP को समर्थन दिया और जमात-ए-इस्लामी को सत्ता से दूर रखा। अलग-अलग इंडस्ट्री की महिलाओं ने स्पष्ट तौर पर BNP को बेहतर विकल्प के रूप में देखा।
पश्चिमी देशों और NGOs की कोशिशें नाकाम
पश्चिमी सरकारों और अंतरराष्ट्रीय NGOs की सक्रियता के बावजूद जमात और मोहम्मद यूनुस की रणनीतियाँ विफल रहीं। US-UK गठबंधन द्वारा दी गई खुली मदद का चुनाव परिणाम पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
छात्र नेताओं की हार
चुनाव में सबसे दिलचस्प मोड़ था छात्र नेताओं की बुरी हार, जिन्होंने शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह करते हुए NCP-नेशनल सिटीजन पार्टी बनाई थी। मोहम्मद यूनुस का समर्थन होने के बावजूद NCP चुनाव में पूरी तरह फेल रही।
जमात-ए-इस्लामी की कोशिशें नाकाम
जमात ने खुद को सुधरी पार्टी और युवा विकल्प के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश की, लेकिन जनता ने कट्टरपंथी विचारधारा को खारिज कर दिया। पार्टी को कुछ सीटें मिलीं, लेकिन BNP की जीत के सामने यह नगण्य रही।
भारत-बांग्लादेश संबंध
तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP की नई सरकार से भारत के लिए स्थिर और सहयोगी संबंधों की संभावना बढ़ गई है। शेख हसीना के दिल्ली में रहने के बावजूद BNP ने नरमी दिखाई है, जो द्विपक्षीय संवाद के लिए अनुकूल संकेत है।
निष्कर्ष: बांग्लादेश ने इस चुनाव में स्पष्ट संदेश दिया है: मुख्यधारा की, मध्यमार्गी राजनीति ही देश का भविष्य तय करेगी, कट्टरपंथ और बाहरी हस्तक्षेप जनता द्वारा खारिज किया गया है। BNP की जीत ने बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता और विकास के नए अवसर खोले हैं।
