
नई दिल्ली/वाशिंगटन: अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर विदेशी वर्कर्स और कंपनियों के बीच हाल ही में कई बदलाव हुए हैं। पिछले साल सितंबर में ट्रंप सरकार ने H-1B वीजा की फीस बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दी थी, जिससे छोटे स्टार्टअप्स के लिए विदेशी वर्कर्स को हायर करना महंगा हो गया। वहीं बड़ी टेक कंपनियों ने अब इस चुनौती का नया तरीका निकाल लिया है, जिससे अमेरिका में पढ़ रहे विदेशी स्टूडेंट्स को फायदा हुआ है।
H-1B वीजा में मुख्य बदलाव:
-
टेक, हेल्थकेयर और फाइनेंस जैसे सेक्टर में हर साल 85,000 नए वीजा जारी होते हैं।
-
इनमें से 20,000 वीजा अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स या उससे ऊपर की डिग्री रखने वाले विदेशी स्टूडेंट्स के लिए रिजर्व हैं।
-
पिछले साल फीस बढ़ने और लॉटरी सिस्टम बदलने के बाद अब वीजा देने में अधिक सैलरी पाने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी।
बड़ी टेक कंपनियों की नई हायरिंग रणनीति:
-
अमेरिका में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को OPT (Optional Practical Training) के तहत 12 महीने और STEM-OPT के तहत 3 साल तक जॉब करने की इजाजत है।
-
बड़ी टेक कंपनियां अब H-1B वीजा पर हायरिंग करने की बजाय सीधे OPT/STEM-OPT स्टूडेंट्स को नौकरी दे रही हैं।
-
इससे कंपनियों को H-1B फीस देने की जरूरत नहीं पड़ती और स्टूडेंट्स को लंबे समय तक अमेरिका में जॉब करने का मौका मिलता है।
-
कंपनियां चाहें तो विदेशी वर्कर्स को अमेरिका बुलाने की बजाय दुनिया के अन्य कार्यालयों में भी नौकरी पर रख सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना:
यदि कोई स्टूडेंट बड़ी टेक कंपनी के जरिए H-1B वीजा के लिए स्पॉन्सर होता है, तो उसे वीजा पाना आसान हो जाता है। इसकी मुख्य वजह कंपनी द्वारा उच्च सैलरी देने के कारण वीजा प्राथमिकता में आ जाता है।
इस नई व्यवस्था से अमेरिका में पढ़ाई पूरी कर चुके विदेशी स्टूडेंट्स को नौकरी पाना पहले से ज्यादा आसान हो गया है और कंपनियों को भी योग्य वर्कर्स को हायर करने में सुविधा मिली है।
