
नई दिल्ली। लद्दाख के एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की हिरासत के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान महात्मा गांधी का नाम चर्चा में आया। इस पर केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से आपत्ति जताते हुए कहा कि सोनम वांगचुक की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से नहीं की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
वांगचुक को लद्दाख में हुई हिंसा के आरोपों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जोधपुर सेंट्रल जेल में एहतियाती हिरासत में रखा गया है। बुधवार को उनकी पत्नी गीतांजलि जे अंगमो की याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि सरकार उनके बयानों से कुछ ज्यादा ही अर्थ निकाल रही है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से आग्रह किया कि NSA के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति की तुलना महात्मा गांधी से न की जाए। उन्होंने कहा कि यह तुलना भारत-विरोधी संदेश दे सकती है।
महात्मा गांधी का जिक्र क्यों हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने वांगचुक के एक बयान का हवाला देते हुए कहा कि “कुछ लोग गांधी के शांति के रास्ते को छोड़ रहे हैं, यह चिंताजनक है।” बेंच ने इसे गांधी के सिद्धांतों पर जोर के रूप में देखा।
इस पर एएसजी मेहता ने कहा कि एक विशेष वाक्य उठाकर वांगचुक को गांधीवादी नहीं बताया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि वांगचुक ने पर्यावरणवाद और अनशन के नाम पर जन-व्यवस्था को बाधित करने की कोशिश की।
कोर्ट में महात्मा गांधी के आखिरी उपवास का भी जिक्र हुआ। बेंच ने कहा कि गांधी ने शांति से मरने की बात कही थी, लेकिन उनकी हत्या के बाद सांप्रदायिक दंगे हुए।
सरकार का तर्क
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “हम उस चीज का महिमामंडन न करें जो पूरी तरह एंटी-इंडिया हो। सोनम वांगचुक की तुलना राष्ट्रपिता से नहीं की जानी चाहिए। कल यह हेडलाइन न बन जाए कि कोर्ट ने वांगचुक को महात्मा गांधी के समान बताया।”
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर उठाए जा रहे स्वास्थ्य कारणों से वांगचुक की रिहाई के मुद्दे पर ‘राई का पहाड़’ बनाने की कोशिश की जा रही है।
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट में सोनम वांगचुक की हिरासत और उनके बयानों को लेकर सरकार और कोर्ट के बीच स्पष्टता और सटीक संदर्भ पर जोर दिया गया। केंद्र सरकार ने जोर देकर कहा कि किसी भी तरह से वांगचुक की तुलना महात्मा गांधी से नहीं की जानी चाहिए, ताकि देशभक्ति और संवैधानिक मर्यादा बनी रहे।
