Thursday, February 12

UNSC सुधार: भारत की स्थायी सदस्यता पर चीन ने फिर किया इन्कार

नई दिल्ली। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है, लेकिन चीन लगातार इसकी राह में अड़ंगा डालता रहा है। हाल ही में दिल्ली में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी और चीन के कार्यकारी उप विदेश मंत्री मा झाओक्सू की बैठक के बाद चीन ने भारत के दावे पर कोई स्पष्ट समर्थन नहीं दिया।

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चीन का रुख

भारतीय विदेश मंत्रालय ने बैठक के बाद बयान जारी किया कि चीन ने भारत की आकांक्षा को समझा और सम्मान करता है। लेकिन चीनी बयान में सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का कोई जिक्र नहीं किया गया। यह पहली बार है कि गलवान घाटी संघर्ष के बाद चीन ने ऐसा बयान दिया, फिर भी वह भारत के पक्ष में स्पष्ट समर्थन देने से बचता दिखा।

पिछले प्रयास और बाधाएँ

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं: अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन। भारत के प्रयासों का अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने कई बार समर्थन किया है।
लेकिन चीन हमेशा सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता के विरोध में रहा है। 2022 में भी चीन के कारण भारत की यह कोशिश असफल रही थी।

भारत की स्थायी सदस्यता का दावेदारी मजबूत क्यों है

  • भारत चीन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है।

  • यह विश्व का तेजी से विकास करने वाला निर्माण हब है।

  • भारत एक परमाणु संपन्न और लोकतांत्रिक राष्ट्र है।

  • इसके अलावा, G-4 देशों (भारत, ब्राजील, जापान, जर्मनी) ने मिलकर UNSC सुधार और स्थायी सीटों के विस्तार की वकालत की है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और सुधार

  • स्थायी सदस्य: अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, चीन (विशेष वीटो अधिकार)।

  • अस्थायी सदस्य: 10 सदस्य, 2 साल के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं।

  • सुधार: UNSC में बदलाव तभी संभव है जब सदस्य देशों के कम से कम 2/3 हिस्सा इस पर राजी हो।

भारत के विरोधी: कॉफी क्लब

भारत की राह में कॉफी क्लब के देश बाधक बने हुए हैं। इस क्लब में शामिल 12 देशों ने सुरक्षा परिषद के विस्तार का विरोध किया है।
इन देशों में पाकिस्तान और तुर्की सबसे सक्रिय रहे हैं, जो अक्सर भारत के प्रस्ताव के खिलाफ बयान देते रहे हैं।

निष्कर्ष:
भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता की मांग वैश्विक स्तर पर मजबूत है, लेकिन चीन और कॉफी क्लब की रोक के कारण अभी यह राह कठिन बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए यह लंबा संघर्ष होगा, जिसमें राजनयिक कौशल और वैश्विक समर्थन की जरूरत होगी।

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