Tuesday, February 10

‘हाईकोर्ट के जज विशेषज्ञ की भूमिका न निभाएं’—सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, जानिए क्या है पूरा मामला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक अदालतों की भूमिका को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि हाईकोर्ट के जजों को विशेषज्ञ (डोमेन एक्सपर्ट) की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि न्यायाधीश अपने मुख्य कर्तव्य से हटकर किसी विषय में “सुपर-एग्जामिनर” बनने लगें, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक स्थिति पैदा कर सकता है।

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यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (JPSC) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की।

किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की?

यह टिप्पणी चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जो झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन ने झारखंड हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की थी।

दरअसल, झारखंड हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की भर्ती परीक्षा (Judicial Service Exam) के एक विवादित प्रश्न को लेकर आदेश दिया था कि—

  • उम्मीदवारों को दो विकल्पों में से किसी एक पर अंक दिए जाएं

  • और दो प्रश्नों को परीक्षा से हटाया जाए

‘सुपर-एग्जामिनर’ नहीं बन सकता हाईकोर्ट: CJI सूर्यकांत

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि—
क्या केवल इसलिए कि परीक्षा न्यायिक अधिकारियों की भर्ती के लिए है और प्रश्न कानून से जुड़ा है, हाईकोर्ट को सुपर-एग्जामिनर की भूमिका निभानी चाहिए?

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हाईकोर्ट के जज खुद को डोमेन एक्सपर्ट मानकर प्रश्नपत्र और उत्तर कुंजी में हस्तक्षेप करने लगें, तो यह बेहद खतरनाक परंपरा बन सकती है।

‘कल कोई जज बायोकेमिस्ट्री जानता होगा…’

सुप्रीम कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि—
यदि कोई जज बायोकेमिस्ट्री का जानकार हो, तो क्या वह बायोकेमिस्ट्री से संबंधित भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र और उत्तर कुंजी में हस्तक्षेप करने लगे?

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों को विषय विशेषज्ञों पर छोड़ना चाहिए, न कि अदालतों को खुद निर्णयकर्ता बनकर उत्तर तय करने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर क्या कहा?

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार जरूर है, लेकिन उसे सीधे तौर पर परीक्षा के उत्तर तय करने के बजाय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि—
उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) या उत्तर कुंजी में बदलाव की प्रक्रिया सभी परीक्षाओं के लिए समान होनी चाहिए, न कि केवल न्यायिक सेवा परीक्षा के लिए।

विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट से कहा कि वह एक विशेषज्ञ समिति गठित करे, जिसमें—

  • कानून के विशेषज्ञ

  • अंग्रेजी के विशेषज्ञ

  • अन्य विषय विशेषज्ञ

शामिल हों, ताकि उत्तर कुंजी और उत्तर पुस्तिकाओं की निष्पक्ष जांच की जा सके।

दो सप्ताह में रिपोर्ट देने के निर्देश

जब याचिकाकर्ता पक्ष ने मामले के जल्द निपटारे की मांग की, तो सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से कहा कि वह दो सप्ताह के भीतर विवाद का समाधान कर JPSC को रिपोर्ट भेजे।

वकील ने अदालत को बताया कि झारखंड न्यायिक सेवा में पिछले ढाई वर्षों से कोई भर्ती नहीं हुई है।

CJI की चिंता: 2017 से पदोन्नति नहीं

इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें इस बात की ज्यादा चिंता है कि 2017 से हाईकोर्ट के जजों के रूप में वकीलों की कोई पदोन्नति नहीं हुई है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायपालिका की सीमाओं और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करती है। अदालत ने साफ कर दिया कि हाईकोर्ट का काम विशेषज्ञ बनकर उत्तर तय करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष अंपायर की तरह विवादों का समाधान करना है। यदि न्यायाधीश विशेषज्ञ भूमिका निभाने लगें, तो यह न्यायिक संतुलन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

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