
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में संपन्न ट्रेड डील दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने का अवसर देती है। लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह समझौता लंबे समय तक स्थिर और संतुलित संबंध बनाए रख पाएगा।
डील का महत्व
इस समझौते का महत्व कम करके नहीं आंका जा सकता। डील भारत और अमेरिका को तुरंत आने वाले आर्थिक संकट से बचाने में मदद करेगी। भारत ने अपनी सबसे अहम रणनीतिक साझेदारी में बाधा डालने वाली समस्याओं को दूर किया है।
सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियाँ
पहला मुद्दा: भारत-पाकिस्तान संबंध
अमेरिका का रवैया पाकिस्तान के प्रति और ट्रंप का पाकिस्तान के साथ दोस्ताना बढ़ाना भारत के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी करता है। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने व्यापारिक गतिरोध दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। अब देखना होगा कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन बनाकर चल पाएंगे या नहीं। भारत हमेशा से द्विपक्षीय बातचीत का पक्षधर रहा है।
दूसरा मुद्दा: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्रतिबद्धता
ट्रंप अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के साथ ‘स्थिर शांति, निष्पक्ष व्यापार और सम्मानजनक संबंध’ चाहते हैं। भारत-अमेरिका व्यापारिक मतभेद क्वाड जैसे समूहों की प्रगति में बाधा माने जा रहे थे। डील के बाद क्वाड की बैठक और सहयोग का मार्ग साफ हो सकता है। हालाँकि अमेरिका की 2026 राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाए रखने का जिक्र है, लेकिन इसमें भारत या क्वाड का नाम शामिल नहीं है।
तीसरा मुद्दा: भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
भारत अपने भू-राजनीतिक संबंधों, खासकर अमेरिका, रूस और चीन के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए रणनीतिक स्वायत्तता का प्रयोग करता रहेगा। ट्रंप के कहने पर भारत ने रूसी तेल खरीदना कम किया हो सकता है, लेकिन वह रक्षा और बहुपक्षीय मंचों जैसे SCO और BRICS में रूस के साथ मिलकर काम करता रहेगा। भारत चाहता है कि इसके कदम को रणनीतिक स्वायत्तता में कमी नहीं माना जाए।
चौथा मुद्दा: H-1B वीजा कार्यक्रम
अमेरिका द्वारा H-1B वीजा कार्यक्रम में बदलाव भारत को पसंद नहीं है। भारत उम्मीद कर रहा है कि इस मुद्दे पर वॉशिंगटन ध्यान देगा।
क्या डील भारत की टेंशन बढ़ाएगी?
भारत चिंतित है कि अमेरिका, ट्रंप के नेतृत्व में, रिश्तों को लेन-देन के मॉडल पर ले जा सकता है। ट्रंप ने भारत से कई दावे जोड़े हैं जैसे:
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रूसी तेल न खरीदने का वादा
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अमेरिका से 500 अरब डॉलर के ऊर्जा और अन्य उत्पाद खरीदना
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अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर जीरो टैरिफ
हालांकि भारत ने इन दावों में से किसी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इनमें से कई केवल राजनीतिक बयानबाजी हो सकती है, न कि अंतिम निर्णय।