
नई दिल्ली: भारत में अगले दो दशकों में कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्तमान में हर साल करीब 15 लाख नए मरीज सामने आते हैं, जो 2045 तक बढ़कर लगभग 25 लाख तक पहुँच सकते हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए एक्सपर्ट्स ने चेताया है कि कैंसर से निपटने के लिए रोकथाम, जल्दी पहचान, सस्ता और सुलभ इलाज और मरीजों को भावनात्मक सहारा देना बेहद जरूरी है।
एक्सपर्ट्स की राय
ज्योत्सना गोविल, चेयरपर्सन, इंडियन कैंसर सोसाइटी (ICS), दिल्ली ने कहा, “जहाँ तक संभव हो, कैंसर को होने से रोकना और उसका जल्दी पता लगाना सबसे महत्वपूर्ण है। बजट से इलाज सस्ता होने का रास्ता खुला है, लेकिन हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज बीमारी के ऐसे स्टेज तक न पहुँचें, जहाँ दवाइयाँ ही उनका एकमात्र सहारा हों।”
डॉ. नितेश रोहतगी, सीनियर डायरेक्टर (ऑन्कोलॉजी), फोर्टिस मेमोरियल हॉस्पिटल ने बताया कि उम्र के हिसाब से सही जांच, जल्दी बीमारी का पता लगाना और नई जांच तकनीकें मरीजों के ठीक होने की संभावना बढ़ाती हैं और इलाज का खर्च भी कम करती हैं।
डॉ. उर्वशी प्रसाद, नीति आयोग की पूर्व निदेशक ने कहा कि असमानता, कैंसर डेटा की कमी और वित्तीय बाधाएँ अभी भी बीमारी का पता लगाने और इलाज में देरी का कारण बन रही हैं। उन्होंने केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और लगातार सरकारी निवेश की जरूरत पर जोर दिया।
रेनुका प्रसाद, ICS दिल्ली की सेक्रेटरी ने कैंसर मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले भावनात्मक, शारीरिक और आर्थिक बोझ पर प्रकाश डाला। उन्होंने बड़े पैमाने पर जांच कार्यक्रम, पुनर्वास केंद्र और डिजिटल पहुंच के प्रयासों के बारे में बताया।
डॉ. मोनिका पुरी, पब्लिक हेल्थ कंसल्टेंट और WHO की पूर्व अधिकारी ने कहा कि कैंसर रोकथाम, जांच और इलाज की निरंतरता को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने लोगों को तंबाकू और शराब का सेवन न करने, स्वस्थ भोजन करने और नियमित व्यायाम करने की सलाह दी।
नई जांच तकनीकें
डॉ. रोहतगी ने बताया कि नई जांच तकनीकें जैसे मैमोग्राफी, पैप स्मीयर और कोलोनोस्कोपी से कैंसर का जल्दी पता लगाया जा सकता है, जिससे इलाज आसान और असरदार होता है।
राष्ट्रीय योजना की जरूरत
डॉ. उर्वशी प्रसाद ने सुझाव दिया कि सरकार को कैंसर के इलाज और रोकथाम के लिए राष्ट्रीय योजना बनानी चाहिए, जिसमें सभी राज्य शामिल हों। साथ ही बीमा योजनाओं को बेहतर बनाकर मरीजों की आर्थिक सहायता भी सुनिश्चित की जा सकती है।