Tuesday, February 3

Explainer: लोकसभा हंगामे में चर्चा में आए तीन प्रमुख नियम – रूल 349, 358 और 389

नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र में मंगलवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और सत्ता पक्ष के बीच हंगामा उस समय बढ़ गया जब राहुल गांधी ने चीन और डोकलाम मुद्दा उठाते हुए पूर्व आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब का जिक्र किया। सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई और स्पीकर ओम बिरला ने भी इस पर बोलने से रोका। इस दौरान संसदीय कार्यवाही के तीन नियमों – रूल 349, 358 और 389 – का हवाला दिया गया।

This slideshow requires JavaScript.

रूल 349 क्या है?
रूल 349 संसदीय कार्यवाही के दौरान सदस्यों के आचार और व्यवहार को नियंत्रित करता है। इसके तहत सांसद सदन की कार्यवाही से संबंधित विषयों के अलावा किसी किताब, अखबार या पत्र का जिक्र नहीं कर सकते, जब तक कि वह चर्चा से सीधे तौर पर जुड़ा न हो और संसदीय परंपराओं के अनुसार उचित न माना जाए। इस नियम का उद्देश्य सदन में केवल सत्यापित और प्रासंगिक जानकारी पर चर्चा सुनिश्चित करना है और संसदीय गरिमा बनाए रखना है।

राहुल गांधी पर यह नियम इसलिए लागू हुआ क्योंकि उन्होंने अनपब्लिश्ड किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के अंश पढ़ने की कोशिश की, जिस पर स्पीकर और सत्ता पक्ष ने आपत्ति जताई। हालांकि, जानकारों का कहना है कि रूल 349 पूरी तरह किताबों या अखबारों पर रोक नहीं लगाता; सामग्री का जिक्र तब किया जा सकता है जब वह चर्चा के विषय से स्पष्ट रूप से जुड़ी हो और राष्ट्रीय सुरक्षा या संसदीय परंपराओं का उल्लंघन न करती हो।

रूल 358 क्या है?
यह नियम सदस्यों को किसी प्रस्ताव, संकल्प या विधेयक पर बोलने की प्रक्रिया और क्रम को नियंत्रित करता है। इसके अनुसार, सदस्य एक प्रस्ताव पर बिना स्पीकर की अनुमति या जवाब देने के अधिकार के एक से अधिक बार नहीं बोल सकते।

रूल 389 क्या है?
रूल 389 लोकसभा के स्पीकर को यह अधिकार देता है कि वे ऐसे मामलों को संभालें जो नियमों में स्पष्ट रूप से नहीं बताए गए हैं। स्पीकर सदन की कार्यवाही को विनियमित करने के लिए निर्देश जारी कर सकते हैं और यह तय कर सकते हैं कि किसी विषय का जिक्र सदन में स्वीकार्य है या नहीं।

महत्व:
ये नियम संसद की कार्यवाही में व्यवस्था और मर्यादा बनाए रखने, राष्ट्रीय सुरक्षा और संवेदनशील सामग्री पर नियंत्रण रखने, और सदस्यों के बीच उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

इस हंगामे ने फिर से यह साफ कर दिया कि संसदीय नियम सदस्यों को सत्यापित और प्रासंगिक जानकारी पर ही चर्चा करने का अधिकार देते हैं और स्पीकर को सदन में नियमों के अनुपालन का अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है।

Leave a Reply