Tuesday, February 3

सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सऐप और मेटा को फटकारा, कहा – निजता के अधिकार के साथ खेल नहीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक और व्हाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि “डेटा साझा करने के नाम पर नागरिकों की निजता के अधिकार के साथ खेल नहीं किया जा सकता।” चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने अदालत में स्पष्ट किया कि टेक कंपनियों को व्यक्तिगत डेटा का उपयोग केवल वैध और पारदर्शी तरीकों से करना होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने मेटा और व्हाट्सऐप से कहा कि “हम आपको एक भी डेटा साझा करने की अनुमति नहीं देंगे। या तो आप स्पष्ट आश्वासन दें कि उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग नहीं होगा, या हमें आदेश पारित करना पड़ेगा।” अदालत ने यह भी कहा कि प्राइवेसी की शर्तें इतनी जटिल हैं कि आम नागरिक उन्हें समझ नहीं पाते, और इसे निजी जानकारी की चोरी करने का एक सभ्य तरीका नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भी इस मामले में पक्षकार बनाया। मुकुल रोहतगी और अखिल सिब्बल की ओर से पेश मेटा और व्हाट्सऐप ने अदालत को बताया कि जुर्माने की राशि जमा कर दी गई है और वे हलफनामा दाखिल करेंगे। अदालत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए सुनवाई अगले सोमवार तक स्थगित कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि:
यह विवाद भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के 2024 के आदेश से शुरू हुआ। CCI ने पाया कि व्हाट्सऐप ने 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी के तहत उपयोगकर्ताओं पर “लो या छोड़ दो” (Take-it-or-leave-it) ढांचा थोप दिया, जिससे वास्तविक विकल्प उपलब्ध नहीं था। इसके तहत मेटा प्लेटफॉर्म्स की अन्य इकाइयों के साथ डेटा साझा करना भी अनिवार्य कर दिया गया। CCI ने इसे प्रतिस्पर्धा अधिनियम के तहत प्रभुत्व का दुरुपयोग माना और मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।

व्हाट्सऐप और मेटा ने जनवरी 2025 में आदेश को NCLAT में चुनौती दी। नवंबर 2025 में NCLAT ने विज्ञापन उद्देश्यों के लिए डेटा साझा करने पर पांच साल का प्रतिबंध हटा दिया, लेकिन 213.14 करोड़ के जुर्माने को बरकरार रखा। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पहुंचा है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि व्हाट्सऐप एकाधिकार की स्थिति में है और उपभोक्ताओं के पास विकल्प नहीं है। टेक कंपनियां संवैधानिक मूल्यों और नागरिकों की निजता का सम्मान करें, नहीं तो अदालत सख्ती से कार्रवाई करेगी।

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