
नई दिल्ली: आज़ादी के बाद से भारत में हर साल बजट पेश करने की परंपरा रही है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस साल 1 फरवरी 2026 को संसद में सुबह 11 बजे बजट पेश करेंगी। देश के इतिहास में कई ऐसे बजट आए हैं, जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल दी। आइए जानते हैं कुछ ऐतिहासिक बजटों के बारे में।
बजट 1947:
देश के स्वतंत्र होने के तुरंत बाद पहला बजट पेश किया गया। आर. के. षनमुखम चेट्टी ने 26 नवंबर 1947 को यह बजट पेश किया। उस समय मुख्य चुनौती शरणार्थियों की व्यवस्था थी, और बजट ने इसके लिए दिशा-निर्देश दिए।
बजट 1951:
जॉन मथाई द्वारा पेश इस बजट ने योजना आयोग की स्थापना की राह प्रशस्त की। पहली बार बजट की विस्तृत कॉपी जनता के लिए जारी की गई और उच्च आय वालों पर ‘सुपर टैक्स’ लगाया गया।
बजट 1957:
टी टी कृष्णामाचारी द्वारा पेश इस बजट में आयात के लिए लाइसेंस अनिवार्य किया गया, वेल्थ टैक्स लगाया गया और एक्साइज ड्यूटी में 400% तक वृद्धि की गई।
बजट 1968:
मोरारजी देसाई का यह बजट ‘पीपुल सेंसिटिव’ कहा गया। इसमें फैक्टरी गेट पर सामान की स्टाम्पिंग और एसेसमेंट की बाध्यता समाप्त की गई, और सेल्फ एसेसमेंट की सुविधा शुरू की गई।
बजट 1973:
यशवंतराव बी. चव्हाण ने इस बजट में कोयला खदानों और अन्य उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के लिए प्रावधान किया। वित्त वर्ष 1973-74 में अनुमानित घाटा 550 करोड़ रुपये रहा।
बजट 1991:
मनमोहन सिंह का यह बजट भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत माना जाता है। लाइसेंस राज खत्म हुआ और बड़े सेक्टर देशी-विदेशी कंपनियों के लिए खुले।
बजट 2005:
पी. चिदंबरम का ‘आम आदमी का बजट’ ग्रामीण रोजगार योजना MNREGA और आरटीआई कानून के लिए प्रसिद्ध रहा। कॉरपोरेट टैक्स और कस्टम ड्यूटी में कटौती की गई।
बजट 2017:
अरुण जेटली ने इस बजट में वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया। अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को एकीकृत किया गया, जिससे उद्योग और ग्राहकों दोनों को लाभ मिला।
बजट 2020:
निर्मला सीतारमण का यह बजट सबसे लंबा भाषण देने वाला बजट माना गया। इसमें नया पर्सनल इनकम टैक्स रिजीम पेश किया गया, जिसे आम भाषा में न्यू टैक्स रिजीम कहा जाता है।
इन बजटों ने न केवल अर्थव्यवस्था की दिशा बदली, बल्कि देश के सामाजिक और औद्योगिक ढांचे को भी मजबूत किया।