Thursday, January 29

भारतीय हाइपरसोनिक मिसाइल से बदला हिंद महासागर का सामरिक संतुलन चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति पर भारत का निर्णायक प्रहार

नई दिल्ली।
भारत ने अपनी समुद्री सैन्य क्षमता में एक ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए लंबी दूरी की हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) को सार्वजनिक कर दिया है। यह केवल एक नया हथियार नहीं, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में पावर बैलेंस बदलने वाला रणनीतिक कदम माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिसाइल चीन की बहुचर्चित स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को गंभीर रूप से कमजोर कर सकती है।

This slideshow requires JavaScript.

DRDO की बड़ी उपलब्धि

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित यह मिसाइल करीब 1500 किलोमीटर की रेंज में दुश्मन के युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे हाई-वैल्यू टारगेट को नष्ट करने में सक्षम है। दो-चरणीय सॉलिड प्रोपल्शन सिस्टम से लैस यह मिसाइल Mach 10 तक की गति हासिल कर सकती है और क्वासी-बैलिस्टिक ट्रेजेक्टरी में उड़ते हुए औसतन Mach 5 की रफ्तार बनाए रखती है।

सबसे अहम बात यह है कि यह मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ान भरती है, जिससे इसे रडार पर पकड़ना और एयर डिफेंस सिस्टम से इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही विशेषता इसे मौजूदा एंटी-शिप मिसाइलों से कहीं अधिक घातक बनाती है।

एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए बड़ा खतरा

LR-AShM को विशेष रूप से एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। आधुनिक युद्ध में एयरक्राफ्ट कैरियर किसी भी नौसेना की रीढ़ माने जाते हैं। ऐसे में यह मिसाइल चीन और पाकिस्तान की संयुक्त समुद्री रणनीति के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरी है।

‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ पर भारत की काट

चीन ने भारत को घेरने के लिए ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत हिंद महासागर क्षेत्र में कई रणनीतिक ठिकाने विकसित किए हैं। इनमें पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह और म्यांमार के बंदरगाह शामिल हैं। ये सभी ऐसे दोहरे उपयोग वाले इंफ्रास्ट्रक्चर हैं, जिनका सैन्य इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

भारत की नई हाइपरसोनिक मिसाइल इन ठिकानों और वहां तैनात नौसैनिक प्लेटफॉर्म्स के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।

मलक्का स्ट्रेट: चीन की कमजोर नस

मलक्का स्ट्रेट को हिंद महासागर में प्रवेश का द्वार और चीन की चोक प्वाइंट’ कहा जाता है। चीन का अधिकांश कच्चा तेल और व्यापारिक शिपमेंट इसी रास्ते से गुजरता है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से मलक्का स्ट्रेट की दूरी मात्र 150 किलोमीटर है।

रिपोर्ट्स के अनुसार भारत इस मिसाइल को अंडमान में स्थित सैन्य ठिकानों पर तैनात कर सकता है। ऐसे में मलक्का स्ट्रेट से गुजरने वाले दुश्मन के युद्धपोत, पनडुब्बियां और एयरक्राफ्ट कैरियर सीधे भारत की मारक क्षमता के दायरे में आ जाएंगे।

लेयर्ड अटैक की क्षमता

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस मिसाइल का इस्तेमाल पनडुब्बियों, ब्रह्मोस से लैस युद्धपोतों और नौसैनिक विमानों के साथ मिलाकर लेयर्ड अटैक में कर सकता है। इससे दुश्मन के डिफेंस सिस्टम पर एक साथ कई दिशाओं से हमला किया जा सकेगा, जिससे बचाव लगभग असंभव हो जाएगा।

चीन बनाम भारत: नौसैनिक असंतुलन

अमेरिकी रक्षा विभाग की 2024 की चीन मिलिट्री पावर रिपोर्ट के अनुसार चीन के पास 370 से अधिक युद्धपोत और पनडुब्बियां थीं, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 395 हो चुकी हैं और 2030 तक यह संख्या 435 तक पहुंच सकती है।

इसके मुकाबले भारतीय नौसेना के पास फिलहाल लगभग 150 युद्धपोत हैं, हालांकि 2027 तक यह संख्या 230 तक पहुंचने की संभावना है। ऐसे में संख्यात्मक कमी की भरपाई के लिए हाइपरसोनिक मिसाइलें भारत के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं।

सामरिक संदेश साफ

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज (IISS) की विशेषज्ञ दर्शना बरुआ के अनुसार, चीन हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार नौसैनिक अभ्यास कर रहा है और पड़ोसी देशों में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश कर रहा है, जिनका सैन्य उपयोग संभव है। ऐसे परिदृश्य में भारत की एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइलें उसकी डिटरेंस क्षमता को निर्णायक रूप से मजबूत करती हैं।

निष्कर्ष

LR-AShM केवल एक मिसाइल नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक चेतावनी है—कि समुद्री प्रभुत्व की किसी भी कोशिश का जवाब अब तेज, सटीक और विनाशक होगा। आने वाले वर्षों में यह हथियार भारत की समुद्री सुरक्षा नीति का केंद्रबिंदु बनने जा रहा है।

 

Leave a Reply