
सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल वक्फ न्यायाधिकरणों के अस्तित्व मात्र से दीवानी अदालतों का अधिकार क्षेत्र स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। न्यायालय ने कहा कि वक्फ न्यायाधिकरणों का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं संपत्तियों तक सीमित है, जो अधिनियम के अंतर्गत “वक्फ की सूची” में अधिसूचित या विधिवत पंजीकृत हैं।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अपंजीकृत संपत्ति से जुड़े मामले में दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र को समाप्त मान लिया गया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम की धारा 85 दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र का पूर्ण और सर्वव्यापी निष्कासन नहीं करती।
न्यायालय ने कहा कि धारा 85 के तहत केवल उन्हीं मामलों में दीवानी अदालतों को विचार करने से रोका गया है, जिन पर वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा आदेश पारित किया जा सकता है या जिन पर न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही शुरू की जा सकती है। यदि संबंधित संपत्ति न तो अधिसूचित है और न ही वक्फ अधिनियम के तहत पंजीकृत है, तो उसे वक्फ मानने का अधिकार न्यायाधिकरण को प्राप्त नहीं होगा।
पीठ ने अपने निर्णय में यह भी स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले उसका अधिनियम के अनुसार विधिवत सूचीबद्ध या पंजीकृत होना अनिवार्य है। ऐसे मामलों में दीवानी अदालतें अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी वक्फ अधिनियम की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि अपंजीकृत संपत्तियों से जुड़े विवादों में दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र को स्वतः समाप्त नहीं किया जा सकता।