
मुंबई, विश्वनाथ सुमन: महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे का करिश्मा आज भी कायम है, लेकिन उनके उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे मुंबई की राजनीति में अपने पिता की छवि को कायम नहीं रख सके। जिस ठाकरे ब्रांड ने छह दशकों तक मुंबई पर प्रभाव बनाए रखा, वह बीएमसी चुनाव में हार के बाद कमजोर नजर आया।
बाल ठाकरे: मुंबई की राजनीति के ‘जस्टिस’
बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना की स्थापना की और मराठी मानूस के अधिकारों के लिए लंबी राजनीतिक यात्रा तय की। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री, ट्रेड यूनियनों और बिजनेस वर्ग तक पर अपना प्रभाव दिखाया। बाल ठाकरे के सामने विरोधी भी कायदे में रहे और पार्टी में कई बागी हुए, लेकिन उनके करिश्मे के सामने टिक नहीं सके। उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व ने मुंबई में उन्हें राजनीतिक ‘जस्टिस’ की हैसियत दी।
उद्धव ठाकरे के प्रयोग और हार
2003 में उद्धव ठाकरे को उत्तराधिकारी बनाया गया, लेकिन बाल ठाकरे के निधन के बाद उनके राजनीतिक प्रयोगों ने शिवसेना की ताकत को कमजोर किया। उग्र हिंदुत्व को पीछे रखकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन और पार्टी में बगावत ने ठाकरे ब्रांड की छवि को फीका कर दिया। 2026 के बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज ठाकरे का संयुक्त प्रयास भी बाल ठाकरे के जमाने के किले को नहीं बचा सका।
विशेषज्ञों की राय
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ठाकरे ब्रांड अभी भी प्रासंगिक है, लेकिन अब उसकी ताकत सीमित हो गई है। समर्थक और विरोधी दोनों ही बाल ठाकरे की स्मृति और राजनीतिक प्रभाव को याद करते हैं। उद्धव ठाकरे के प्रयोग और गठबंधन की रणनीति ने पारंपरिक ठाकरे ब्रांड की शक्ति को कमजोर कर दिया है।
निष्कर्ष:
मुंबई में बाल ठाकरे का राजनीतिक करिश्मा आज भी जीवित है, लेकिन उत्तराधिकारियों की गलत रणनीति और समय की बदलती राजनीति ने ठाकरे ब्रांड को पहले जैसी मजबूती नहीं दी। बीएमसी चुनाव में हार इसका साफ संकेत है।