
पटना।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मिथिला और मैथिली भाषा से जुड़ाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और आत्मीय भी रहा है। नालंदा (मगध क्षेत्र) में जन्मे नीतीश कुमार ने जब दिसंबर 2017 में दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित अखिल भारतीय मिथिला संघ के स्वर्ण जयंती समारोह में करीब आठ मिनट तक धाराप्रवाह मैथिली में भाषण दिया, तो श्रोतागण आश्चर्य और गर्व से भर उठे। यह भाषण न सिर्फ उनकी भाषायी दक्षता का प्रमाण था, बल्कि मिथिलांचल के प्रति उनके पुराने लगाव की झलक भी।
कार्यक्रम में देशभर से जुटे मैथिली भाषी लोग तब और भावुक हो गए, जब मुख्यमंत्री ने पूरी सहजता से मैथिली में अपने विचार रखे। कुल लगभग 11 मिनट के संबोधन में अधिकांश हिस्सा मैथिली भाषा में था, जिसने नीतीश कुमार को मिथिला समाज के और करीब ला दिया।
मैथिली से कैसे बना यह रिश्ता?
नीतीश कुमार के अनुसार, मिथिला से उनका नाता राजनीति में आने से भी पहले का है। जब वे बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (वर्तमान एनआईटी पटना) में पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके घनिष्ठ मित्र नरेन्द्र कुमार सहरसा जिले के रहने वाले थे। नरेन्द्र कुमार की खासियत यह थी कि वे लगभग हर बातचीत—यहां तक कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई से जुड़ी चर्चा भी—मैथिली में ही करते थे।
शुरुआत में यह आदत नीतीश कुमार को अटपटी लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे मैथिली की मिठास उन्हें भाने लगी। मित्रता का असर ऐसा हुआ कि नीतीश कुमार स्वयं भी मैथिली बोलने लगे और दोनों आपस में प्रायः मैथिली में ही संवाद करने लगे। यही मित्रता नीतीश कुमार के मैथिली प्रेम की नींव बनी।
जीवन के अहम मोड़ों पर मैथिली मित्र का साथ
नरेन्द्र कुमार, नीतीश कुमार के जीवन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मित्र रहे। जब नीतीश कुमार के पिता ने उनकी शादी तय की और दहेज की बात सामने आई, तो वे आहत हो गए। पिता के प्रति सम्मान के कारण वे सीधे विरोध नहीं कर पाए। ऐसे में नरेन्द्र कुमार ही थे, जिन्होंने बख्तियारपुर जाकर नीतीश कुमार के पिता से बात की और बिना दहेज सादगीपूर्ण विवाह की इच्छा स्पष्ट की।
हिचक और आत्मविश्वास के बीच मैथिली
नीतीश कुमार ने मैथिली भले ही सीख ली थी, लेकिन लंबे समय तक उन्हें यह संकोच रहा कि कहीं सार्वजनिक मंच पर गलती हो गई तो लोग हंसेंगे। इसी हिचक के कारण वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में मैथिली बोलने से बचते रहे। लेकिन 2017 में अखिल भारतीय मिथिला संघ के मंच पर पहुंचकर वे खुद को रोक नहीं पाए और खुले दिल से मैथिली में बोले—जिसे मिथिला समाज ने सम्मान और अपनत्व के साथ स्वीकार किया।
मिथिलांचल के विकास में भूमिका
राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मिथिलांचल के विकास के लिए नीतीश कुमार की भूमिका को विरोधी दलों ने भी स्वीकार किया है। जून 2003 में, जब वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे, तब कोसी नदी पर निर्मली पुल के निर्माण की मंजूरी दिलाना एक ऐतिहासिक कदम माना गया। इस पहल की उस समय कांग्रेस नेताओं ने भी सराहना की थी।
मैथिली को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने में अहम योगदान
नीतीश कुमार की पहल पर ही मैथिली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का रास्ता प्रशस्त हुआ। उन्होंने बताया कि 2003 में निर्मली पुल के शिलान्यास के लिए जाते समय उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिथिला की भावनाओं का जिक्र किया था। उसी दिन प्रधानमंत्री ने मैथिली को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की घोषणा की, जिसे बाद में 92वें संविधान संशोधन के माध्यम से लागू किया गया।