
ब्यावर (राजस्थान)।
राजियावास गांव की गलियों में उस दिन सन्नाटा कुछ अलग था। न कोई इंसान विदा हो रहा था, न कोई पारंपरिक शोकसभा थी, लेकिन आंखें नम थीं और दिल भारी। गांव ने अपना वह सदस्य खो दिया था, जो न किसी एक घर का था, न किसी परिवार का—फिर भी पूरे गांव का अपना था।
नाम था डॉग-सा।
राजस्थान की संस्कृति में ‘सा’ संबोधन सम्मान और अपनत्व का प्रतीक है। वर्षों पहले गांव वालों ने यह संबोधन उस आवारा कुत्ते को दिया, जो समय के साथ राजियावास की सामूहिक भावनाओं का हिस्सा बन गया। वह न बेघर था, न पराया—वह गांव का था।
सर्द सुबह और सामूहिक फैसला
3 जनवरी की कड़ाके की ठंड में डॉग-सा का निधन हो गया। खबर फैलते ही गांव में एक मौन-सा छा गया। किसी पंचायत की जरूरत नहीं पड़ी, न कोई औपचारिक निर्णय—सबकी राय एक थी।
“उसे वही विदाई मिलेगी, जिसकी वह हकदार था।”
ग्रामीणों ने स्वेच्छा से चंदा किया, लकड़ियां जुटाईं, पिकअप वाहन की व्यवस्था हुई। अर्थी सजी, भजन शुरू हुए और इंसानों की तरह अंतिम यात्रा निकली। डीजे वाहन पर रामधुन बज रही थी और करीब सौ ग्रामीण पिकअप के पीछे-पीछे चल रहे थे। दृश्य किसी बुजुर्ग परिजन की विदाई जैसा था।
दुख के हर घर में रहता था साथ
राजियावास ग्राम पंचायत के सरपंच बृजपाल सिंह रावत बताते हैं कि डॉग-सा को गांव से जोड़ने वाली कोई एक घटना नहीं थी, बल्कि उसकी एक आदत थी—
दुख में साथ देना।
गांव में जब भी किसी की मृत्यु होती, वह शोकाकुल घर के बाहर बैठा दिखाई देता। अंतिम यात्रा निकलती तो वह पीछे-पीछे श्मशान या कब्रिस्तान तक जाता। संस्कार के दौरान वहीं बैठा रहता और अगले कई दिनों तक उसी घर के आसपास मंडराता।
हिंदू परिवार हो या मुस्लिम—डॉग-सा के लिए फर्क नहीं था। मुस्लिम समुदाय में निधन होने पर भी वह कब्रिस्तान तक जाता। उसकी निष्ठा किसी धर्म से नहीं, दुख से थी।
हिंदू रीति से अंतिम संस्कार, सबकी मौजूदगी
श्मशान घाट पर डॉग-सा का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया। इस विदाई में मुस्लिम समुदाय के लोग भी कंधे से कंधा मिलाकर मौजूद रहे।
ग्रामीणों का कहना था—
“यह कोई अनोखी घटना नहीं, बल्कि वर्षों के रिश्ते का स्वाभाविक अंत है।”
एक कहानी, जो सवाल छोड़ जाती है
जहां अक्सर आवारा कुत्तों को खतरे, आंकड़ों और नियंत्रण की भाषा में देखा जाता है, वहीं राजियावास की यह कहानी रिश्तों की है—
एक ऐसी मौजूदगी की, जो बिना बुलाए दुख के समय साथ खड़ी रही।
डॉग-सा चला गया, लेकिन गांव ने जाते-जाते उससे वही सीखा, जो वह जीवन भर सिखाता रहा—
इंसानियत बिना शर्त होती है।