Saturday, January 24

बेटे और पत्नी को खोने के बाद भी नहीं टूटा हौसला 75 वर्ष की उम्र में रातभर मरीजों की सेवा कर रहे गया के ‘भगवान’ डॉ. संकेत नारायण सिंह

गयाजी।
जहां आज चिकित्सा सेवा तेजी से व्यवसाय का रूप लेती जा रही है, वहीं बिहार के गयाजी जिले में एक डॉक्टर मानवता और सेवा की ऐसी मिसाल पेश कर रहे हैं, जो समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी है। 75 वर्ष की उम्र में भी डॉ. संकेत नारायण सिंह रातभर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। उनके लिए चिकित्सा कमाई का साधन नहीं, बल्कि आजीवन सेवा का माध्यम है।

This slideshow requires JavaScript.

गया शहर के मारनपुर इलाके में स्थित अपने छोटे से क्लिनिक में डॉ. संकेत नारायण सिंह शाम करीब पांच बजे मरीज देखना शुरू करते हैं, जो कई बार अगली सुबह चार या पांच बजे तक चलता है। लकड़ी की साधारण कुर्सी पर बैठकर वे प्रतिदिन औसतन 300 मरीजों की जांच करते हैं। खास बात यह है कि उनकी फीस नाममात्र की है—कोई 10 रुपये देता है तो कोई 100 रुपये, और कई मरीज बिना पैसे दिए भी लौट जाते हैं।

डॉ. सिंह कभी किसी से फीस की मांग नहीं करते, न ही मरीज की आर्थिक स्थिति पूछते हैं। उनके अनुसार, “पैसे का एक उद्देश्य होता है, उसे समाज में वापस लौटना चाहिए।” यही कारण है कि क्लिनिक से होने वाली आय का करीब तीन-चौथाई हिस्सा गरीबों की मदद, जरूरतमंदों के इलाज और शिक्षा पर खर्च कर दिया जाता है। शेष राशि से वे अपने निजी खर्च और क्लिनिक का संचालन करते हैं।

गया के ANMMCH से पढ़ाई पूरी करने वाले डॉ. संकेत नारायण सिंह वर्ष 1980 में मेडिकल कॉलेज अस्पताल से जुड़े थे। इसके बाद वे ईएसआई में मेडिकल ऑफिसर भी रहे, लेकिन सिद्धांतों से समझौता न कर पाने के कारण उन्होंने दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया। वर्ष 1984 में उन्होंने गया में निजी क्लिनिक की शुरुआत की और तभी से समाज सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।

उनकी सेवा केवल मरीजों तक सीमित नहीं है। अब तक वे 80 से अधिक अनाथ बच्चों की जिम्मेदारी उठा चुके हैं। बच्चों को अलग-अलग परिवारों में रखवाया गया, ताकि उनकी पहचान और गरिमा बनी रहे। इसके अलावा कई जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च भी उन्होंने उठाया। डॉ. रामउदगर इसका उदाहरण हैं, जिन्होंने डॉ. सिंह की मदद से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और आज स्वयं डॉक्टर बनकर समाज की सेवा कर रहे हैं।

डॉ. संकेत नारायण सिंह का निजी जीवन भी संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में वे पोलियो से ग्रसित हो गए थे। बाद में एक सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपने इकलौते बेटे आदित्य नारायण को खो दिया। इसके कुछ समय बाद उनकी पत्नी मार्गरीटा सिंह का भी निधन हो गया। इतने गहरे व्यक्तिगत दुखों के बावजूद डॉ. सिंह का सेवा भाव कभी कम नहीं हुआ।

पिछले तीन दशकों से वे अपने पैतृक गांव डुमरी (सारण जिला) और आसपास के इलाकों में करीब 100 बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों की नियमित सहायता कर रहे हैं।

बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार ने कहा, डॉ. संकेत नारायण सिंह मानवता का जीवंत उदाहरण हैं। व्यावसायिक चिकित्सा के इस दौर में उनका जीवन हमें सिखाता है कि सेवा का असली अर्थ क्या है।

निस्संदेह, डॉ. संकेत नारायण सिंह जैसे लोग समाज में उम्मीद की रोशनी हैं—जो यह साबित करते हैं कि सच्ची मानवता आज भी जिंदा है।

 

Leave a Reply