Saturday, January 24

मानव तस्करी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार

 

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मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराध में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को जमानत दिए जाने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को “हल्का-फुल्का और मैकेनिकल” करार देते हुए न केवल उसे रद्द कर दिया, बल्कि इस पर गहरी हैरानी भी जताई। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से भी सवाल किया कि इतने गंभीर मामले में हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती क्यों नहीं दी गई।

 

हाईकोर्ट का जमानत आदेश रद्द

 

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की पीठ ने मानव तस्करी के एक मामले में आरोपी महिला तुलसी को दी गई जमानत को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। यह फैसला बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन गुड़िया स्वयंसेवी संस्थान की याचिका पर सुनवाई के बाद सुनाया गया।

 

पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत देते समय आरोपों की गंभीरता, अपराध की प्रकृति और उसके सामाजिक प्रभाव पर समुचित विचार नहीं किया।

 

‘आरोप बेहद गंभीर, केवल अवधि के आधार पर जमानत गलत’

 

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आरोपी तुलसी पर अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत गंभीर आरोप हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर जमानत दे दी कि आरोपी लगभग पांच वर्ष से जेल में बंद थी, जबकि आरोपों की प्रकृति और गंभीरता पर कोई ठोस चर्चा नहीं की गई।

 

उन्होंने यह भी बताया कि तुलसी की भूमिका दो अन्य मानव तस्करी मामलों की जांच के दौरान सामने आई थी और पीड़ित नाबालिग बच्चों ने उसकी स्पष्ट पहचान की थी।

 

नाबालिगों को वेश्यावृत्ति में धकेलने के आरोप

 

सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया कि आरोपी पर नाबालिग बच्चों को वेश्यावृत्ति में धकेलने जैसे संगीन आरोप हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, जब-जब आरोपी को जमानत मिली, उसने कथित रूप से दोबारा इसी तरह की आपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता दिखाई। यह भी दावा किया गया कि आरोपी वाराणसी के रेड लाइट इलाके में एक कुख्यात मानव तस्कर के रूप में जानी जाती है।

 

हाईकोर्ट के आदेश को बताया ‘टेम्पलेट आधारित’

 

सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय कुमार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह फैसला “बेहद मैकेनिकल” प्रतीत होता है, मानो किसी तय टेम्पलेट के आधार पर पारित किया गया हो। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश, इस जज द्वारा पारित ऐसे कई जमानत आदेश पहले भी देखे गए हैं, जिनमें तथ्यों और परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया।

 

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही हाईकोर्ट पर मामलों का अत्यधिक बोझ हो, लेकिन जमानत जैसे संवेदनशील मामलों में न्यायिक विवेक और गंभीरता की अपेक्षा की जाती है। विशेष रूप से तब, जब मामला बच्चों की तस्करी जैसे जघन्य अपराध से जुड़ा हो।

 

पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीश इस होड़ में लगे हैं कि वे एक दिन में कितनी जमानत याचिकाओं का निपटारा कर सकते हैं, जबकि न्याय की गुणवत्ता और गहराई पीछे छूटती जा रही है।

 

 

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