
प्रयागराज माघ मेले के दौरान चल रहे बसंत पंचमी स्नान पर्व के बीच साधु-संतों से जुड़े विवाद पर जगतगुरु महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा का बड़ा और स्पष्ट बयान सामने आया है। बिना किसी का नाम लिए उन्होंने अशांति फैलाने वालों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जो समाज में विवाद खड़ा करता है, वह सच्चा सनातनी नहीं हो सकता।
माघ मेले में साधुओं के चार माह की धुनी रमाने के कार्यक्रम की शुरुआत के अवसर पर मीडिया से बातचीत में सतुआ बाबा ने कहा कि यदि कोई स्वयं को जगतगुरु शंकराचार्य भगवान का अनुयायी मानता है, तो उसका कर्तव्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। उन्होंने कहा कि साधु-संतों का काम संवाद और साधना के माध्यम से समाज में एकता स्थापित करना है, न कि विवादों को जन्म देना।
‘अशांति फैलाना देशहित के खिलाफ’
सतुआ बाबा ने कहा कि अशांति फैलाने वाले लोगों को आत्ममंथन करना चाहिए कि वे देश और सनातन के हित में काम कर रहे हैं या उसके अहित में। उन्होंने स्पष्ट कहा कि माघ मेला शांति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है, यहां अशांति की कोई जगह नहीं है। ऐसे प्रयास एक षड्यंत्र का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इससे सनातन कभी टूट नहीं सकता।
साधु-संतों की साधना समाज के लिए
उन्होंने बताया कि वैष्णव संत स्नान के बाद चार माह का संकल्प लेते हैं और यह तपस्या केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज और सनातन जगत के कल्याण के लिए होती है। साधुओं की साधना समाज को जोड़ने, आपसी सद्भाव बढ़ाने और राष्ट्रहित के लिए होती है।
बसंत पंचमी पर ‘जोड़ने’ का संदेश
बसंत पंचमी के महत्व पर बोलते हुए सतुआ बाबा ने कहा कि मां सरस्वती से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारी वाणी समाज को जोड़ने वाली हो। उन्होंने कहा कि जब प्रकृति स्वयं किसी से भेदभाव नहीं करती, तो मनुष्य को भी विभाजन की सोच से ऊपर उठना होगा।
कानून व्यवस्था पर भरोसा
साधु-संतों पर प्रशासनिक कार्रवाई के सवाल पर सतुआ बाबा ने कहा कि भारत में कानून का राज है। जो भी कानून का उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी। जांच के बाद ही सच्चाई सामने आएगी।
संतों और भगवा का अपमान अस्वीकार्य
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर अपशब्दों और संतों की तुलना मुगल शासकों से किए जाने पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। सतुआ बाबा ने कहा कि संतों और भगवा की तुलना अकबर जैसे शासकों से करना सनातन और सनातनियों का अपमान है, ऐसी सोच स्वीकार्य नहीं है।
अंत में उन्होंने कहा कि जगतगुरु शंकराचार्य ने पूरे भारत को जोड़ने का कार्य किया था, और जो स्वयं को उनका अनुयायी कहता है, उसे भी जोड़ने की परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए। विवाद नहीं, संवाद ही सनातन की सच्ची पहचान है।