
भारत की आज़ादी के संघर्ष को नई दिशा देने वाले महान क्रांतिकारी नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती 23 जनवरी को पूरे देश में पराक्रम दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह दिन केवल स्मरण का नहीं, बल्कि साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति के संकल्प को दोहराने का अवसर है। नेताजी के ओजस्वी विचार और क्रांतिकारी नारे आज भी युवाओं के रक्त में ऊर्जा और आत्मविश्वास भर देते हैं।
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सुभाष चंद्र बोस उन विरले राष्ट्रनायकों में थे, जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“आजादी दी नहीं जाती, ली जाती है।”
उनका यह विश्वास था कि स्वतंत्रता के लिए केवल मांग नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और बलिदान आवश्यक है। वर्ष 1943 में आजाद हिंद फौज का नेतृत्व कर उन्होंने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई।
युवाओं के लिए प्रेरणा बने नेताजी के विचार
नेताजी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं—
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“आज हमारी सिर्फ एक ही इच्छा होनी चाहिए—मरने की इच्छा, ताकि भारत जिंदा रह सके।”
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“जीत या हार जरूरी नहीं, बल्कि लड़ाई ही सब कुछ है।”
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“इतिहास में कोई भी बड़ा बदलाव केवल बातचीत से नहीं आया है।”
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“अगर जीवन में संघर्ष न हो और जोखिम न उठाना पड़े, तो जीवन का आधा आनंद समाप्त हो जाता है।”
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“एक सच्चे सैनिक को सैन्य और आध्यात्मिक—दोनों प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता होती है।”
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“अगर संघर्ष नहीं, तो विजय असंभव है।”
जो नारे बने स्वतंत्रता संग्राम की पहचान
नेताजी के नारे आज भी राष्ट्रप्रेम और आत्मबल का प्रतीक माने जाते हैं—
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“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”
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“आजादी दी नहीं जाती—ली जाती है”
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“जय हिंद”
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“दिल्ली चलो”
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“जिसके अंदर सनक नहीं, वह कभी महान नहीं बन सकता।”
पराक्रम दिवस का संदेश
पराक्रम दिवस हमें याद दिलाता है कि आज़ादी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सतत कर्तव्य है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार हमें सिखाते हैं कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा, अनुशासन और बलिदान की भावना से ही देश सशक्त बनता है।
23 जनवरी को देशवासी नेताजी को नमन करते हुए उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं—
जय हिंद।