Sunday, January 25

तलाक के बाद बदला समाज का रवैया: रिश्ता टूटने पर महिलाओं को क्यों झेलना पड़ता है भेदभाव?

नई दिल्ली।
शादी टूटने का दर्द पति और पत्नी—दोनों का होता है, लेकिन समाज की नजर में तलाक का बोझ अक्सर सिर्फ महिला के हिस्से आता है। तलाक के बाद जहां पुरुषों को सहानुभूति और समर्थन मिलता है, वहीं महिलाओं को ताने, शक और सामाजिक दूरी का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि आखिर रिश्ता टूटने पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यों किया जाता है?

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रिलेशनशिप काउंसलर डॉ. माधवी सेठ के अनुसार, किसी भी महिला के लिए तलाक का फैसला आसान नहीं होता। अधिकांश महिलाएं हर हाल में शादी बचाने की कोशिश करती हैं। कई महिलाएं बच्चों की खातिर शोषण और मानसिक प्रताड़ना सहते हुए भी विवाह में बनी रहती हैं। जब हालात असहनीय हो जाते हैं, तब मजबूरी में तलाक का निर्णय लिया जाता है।

भारत में तलाक: बदलती सोच, लेकिन अधूरा बदलाव

दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में तलाक की दर अभी भी कम—करीब 1 प्रतिशत—है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में तलाक के मामलों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखी गई है। पहले जहां तलाक को सामाजिक कलंक माना जाता था, वहीं अब लोग असफल रिश्ते को ढोने के बजाय अलग होना स्वीकार करने लगे हैं। बावजूद इसके, यह स्वीकार्यता पुरुषों और महिलाओं के लिए समान नहीं है।

तलाक का महिलाओं पर गहरा असर

विशेषज्ञों के अनुसार, तलाक से पहले और बाद—दोनों ही चरण महिलाओं के लिए बेहद कठिन होते हैं। यदि महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है, तो उसके लिए तलाक लेना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। आत्मनिर्भर महिलाएं अपने और बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी उठा पाती हैं, लेकिन भावनात्मक समर्थन की कमी उन्हें भी भीतर से तोड़ देती है।

तलाक के बाद कई महिलाओं के प्रति परिवार और रिश्तेदारों का व्यवहार बदल जाता है। उन्हें पारिवारिक कार्यक्रमों में बुलाना कम कर दिया जाता है, उनके फैसलों पर सवाल उठाए जाते हैं और अक्सर उन्हें ही रिश्ते टूटने का जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।

महिलाएं तलाक का फैसला कब कर पाती हैं?

भारत में कानूनी रूप से तलाक संभव है, लेकिन सामाजिक दबाव इसे बेहद मुश्किल बना देता है। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाएं आमतौर पर दो परिस्थितियों में तलाक का निर्णय ले पाती हैं—
पहला, जब उन्हें मायके या परिवार का समर्थन मिले।
दूसरा, जब वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों।

जिन महिलाओं के पास ये दोनों आधार नहीं होते, वे चाहकर भी असफल या हिंसक रिश्तों से बाहर नहीं निकल पातीं।

तलाक के बाद का संघर्ष और अकेलापन

तलाकशुदा महिलाओं को समाज में कई तरह की मानसिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार उन्हें गलत नजर से देखा जाता है या ‘उपलब्ध’ मान लिया जाता है। असुरक्षा की भावना के कारण वे सामाजिक मेल-जोल से दूरी बनाने लगती हैं। अकेले बच्चों की जिम्मेदारी उठाना, आर्थिक दबाव और सामाजिक उपेक्षा उन्हें मानसिक रूप से थका देती है।

खुद को संभालना क्यों है जरूरी

डॉ. माधवी सेठ का कहना है कि तलाक के बाद यदि महिला खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगे, तो यह डिप्रेशन का रूप ले सकता है। ऐसी स्थिति में परिवार, दोस्तों या किसी प्रोफेशनल काउंसलर की मदद लेना बेहद जरूरी है। काउंसलिंग न सिर्फ भावनात्मक सहारा देती है, बल्कि महिला को नई शुरुआत के लिए मानसिक रूप से मजबूत भी बनाती है।

निष्कर्षतः, समाज को यह समझने की जरूरत है कि तलाक किसी एक व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि दो लोगों के बीच रिश्ते का टूटना है। जब तक महिलाओं को समान दृष्टि और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक तलाक के बाद उनका संघर्ष सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक भी बना रहेगा।

 

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