
अरुणाचल प्रदेश, 22 जनवरी: अरुणाचल प्रदेश सरकार ने लोहित नदी पर 1,200 मेगावॉट (MW) की कलाई-II जलविद्युत परियोजना को पर्यावरण के अनुकूल बताते हुए मंजूरी दी है। रन-ऑफ-रिवर डिजाइन के कारण इसे सुरक्षित मानते हुए हजारों रोजगार के अवसरों का दावा किया गया है और चीन से सटे होने के कारण इसका रणनीतिक महत्व भी बताया जा रहा है।
लेकिन विशेषज्ञ और स्थानीय आदिवासी इस परियोजना को गंभीर पर्यावरणीय खतरे के रूप में देख रहे हैं। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) रिपोर्ट में संकटग्रस्त सफेद पेट वाले बगुले जैसी दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया है। इससे पूर्वोत्तर भारत की नाजुक पारिस्थितिकी और स्थानीय आजीविका पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है।
ऊर्जा सुरक्षा और विकास के दावे
THDC इंडिया लिमिटेड के तहत 14,176 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होने वाली इस परियोजना से सालाना 485.3 करोड़ यूनिट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। अरुणाचल सरकार इसे पर्यावरणीय दृष्टि से अनुकूल मान रही है, और स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर संकट
लोहित नदी ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदी है और इसकी जैव-विविधता अमूल्य है। 128.5 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी डैम से नदी के 15-23 किलोमीटर हिस्से में पानी डूब जाएगा। पानी का लीन सीजन में रोके जाना निचले इलाकों में सूखे और मॉनसून में अचानक पानी छोड़ने से बाढ़ का खतरा बढ़ा देगा। मछलियों के प्रजनन मार्ग अवरुद्ध होंगे और भूस्खलन, ग्लेशियर झील फटने (GLOF) व भूकंप का जोखिम बढ़ेगा।
सफेद पेट वाले बगुले और अन्य प्रजातियों को खतरा
सफेद पेट वाले बगुले (Ardea insignis) जैसी क्रिटिकली एंडेंजर्ड प्रजातियां इस परियोजना से सीधे प्रभावित होंगी। इनके निवास स्थल, नेस्टिंग साइट्स और भोजन के स्रोत खतरे में पड़ेंगे। WAPCOS की रिपोर्ट में इस पक्षी का उल्लेख न होना गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
स्थानीय समुदाय और आजीविका पर असर
अंजॉ जिले के हवाई सर्कल के आदिवासी गांवों में परियोजना के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। लगभग 1,500 लोग विस्थापित हो सकते हैं। मछली पकड़ना, कृषि और वन आधारित आजीविका प्रभावित होगी। स्थानीय समुदाय ने अपनी सहमति न देने का स्पष्ट संकेत दिया है।
संतुलित विकास की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। स्वतंत्र बेसिन-स्तरीय समग्र प्रभाव अध्ययन (CIA) अनिवार्य होना चाहिए। सफेद पेट वाले बगुले के लिए आर्टिफिशियल फीडिंग जोन और नेस्टिंग मॉनिटरिंग योजना बनाई जानी चाहिए। स्थानीय समुदाय से वास्तविक फ्री, प्रायर और इन्फॉर्म्ड कंसेंट (FPIC) लिया जाना चाहिए। विस्थापितों के लिए जमीन-आधारित पुनर्वास, मछली पालन सहकारी समितियां और प्रोजेक्ट में स्थानीय हिस्सेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। नदी जोनिंग पॉलिसी अपनाई जाए और कुछ हिस्सों को ‘नो-डैम जोन’ घोषित कर पर्यटन आधारित आजीविका बढ़ाई जाए।
यदि ये कदम उठाए जाएं, तो कलाई-II परियोजना न केवल बिजली उत्पादन में योगदान देगी, बल्कि स्थानीय समुदाय का विश्वास भी जीत सकती है।